पलायन से बंजर होती कृषि भूमि पर पूर्व कृषि अधिकारियों की चिंता, समाधान के लिए दिए अहम सुझाव
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन और उसके कारण बंजर होती कृषि भूमि पर पूर्व कृषि अधिकारियों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसके समाधान के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। यह विचार देहरादून के रिंग रोड स्थित एक होटल में आयोजित पूर्व कृषि अधिकारियों की बैठक में सामने आए।

बैठक में उत्तराखंड की कृषि, ग्रामीण विकास और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि पलायन के कारण खेती योग्य भूमि लगातार खाली होती जा रही है, जिससे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि जो लोग रोजगार या अन्य कारणों से गांवों से बाहर रह रहे हैं, वे समय-समय पर अपने मूल गांव जाकर वहां रह रहे कृषक परिवारों को खेती के लिए प्रेरित करें तथा अपने तकनीकी ज्ञान और अनुभव का लाभ किसानों तक पहुंचाएं।
बैठक में पर्वतीय जनपदों की घटती आबादी के कारण भविष्य में होने वाले परिसीमन के दौरान विधानसभा सीटों में संभावित कमी पर भी चिंता व्यक्त की गई। साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासियों से अपने गांव की मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की अपील की गई, ताकि इन क्षेत्रों का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व मजबूत बना रहे।
सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि पूर्व कृषि अधिकारियों की बैठक प्रत्येक तीन माह में आयोजित की जाएगी। बैठक में यह भी संकल्प लिया गया कि सभी पूर्व कृषि अधिकारी अपने अनुभव और विशेषज्ञता के माध्यम से उत्तराखंड के कृषि विकास में सक्रिय योगदान देते रहेंगे।
बैठक में संयोजक नरेश नौटियाल के साथ वी.के. धस्माना, नंदन सिंह, गोपाल सती, राजेंद्र सिंह, बलवीर सिंह भंडारी, पूर्व कृषि निदेशक के. लाल, गुलाब सिंह बेडवाल, एम.के. काला, इंद्र सिंह बिष्ट, नरेंद्र सिंह रावत, डी.एस. नेगी, संजय चंदोला सहित कई पूर्व कृषि अधिकारियों ने अपने विचार रखे।
अंत में दिवंगत कृषि निदेशक गौरी शंकर एवं पी.सी. शर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया।
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