गौचरचमोली

गौचर–जौलजीबी मेलों में बदलता स्वरूप: पाश्चात्य फास्ट फूड और विदेशी सामान का बढ़ा दबदबा

 

ऊनी परंपरा से फास्ट फूड संस्कृति तक: गौचर और जौलजीबी मेलों की बदलती तस्वीर

विदेशी कालीन से मोमो-मैगी तक: पारंपरिक मेलों पर आधुनिकता का असर

पहाड़ी संस्कृति पर बाज़ारवाद की चोट, फिर भी मेलों का आकर्षण बरकरार

गौचर–जौलजीबी मेले: परंपरा और आधुनिकता की टकराहट के बीच बढ़ती भीड़

गौचर।
तिब्बत से लाए जाने वाले,ऊन, एवं ऊनी वस्त्रों की खरीद, बिक्री केंद्र के रूप में शुरू हुए गौचर व जौलजीबी मेलों में जहां पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित खान पान ने कब्जा कर लिया है वहीं कोरिया से बने कालीन भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। बावजूद इसके मेले के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है।
पिथौरागढ़ के जौलजीबी और जनपद चमोली के गौचर में लगने वाले मेले ऐसे समय में आयोजित होते हैं जब क्षेत्र के कास्तकार अपनी खेती-बाड़ी के कामों से फुर्सत के क्षणों में होते हैं। बेटी बहुओं के मिलन के साथ साथ जरुरत का खासकर जाड़ों के सीज़न का सामान खरीदने के लिए दोनों मंडलों में इन मेलों का काफी महत्व रहा है। अब स्थितियां बदल गई हैं। यातायात का साधन होने की वजह से सामान की मंडियां गांव गांव तक पहुंच गई हैं। मेले में अब ऊनी वस्त्रों की जगह कोरिया बेल्जियम में बने कैसमिलोन के कालीनों और मटर से बने छोलों की जगह पाश्चात्य संस्कृति पर आधारित चाउमीन,मैगी व मोमो जैसे फास्ट फूडों ने ले ली है। यही कारण है कि मेले में होटल का कारोबार करने वाला छोटा हो या बड़ा हर कोई लोगों की पसंद की वजह से इन व्यंजनों को अपनी आमदनी का जरिया बना रहा है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से गौचर मेले में भोटिया जनजाति के लोगों द्वारा लाए जा रहे फरण,मलारी गमशाली की राजमा तथा स्वयं सहायता समूहों द्वारा लाई जा रही पहाड़ी दालों ने अपनी पकड़ जरुर बना ली है। मेले में जहां जोर शोर से गूंजते लाउड स्पीकर, शराब पीकर उधम मचाते शराबियों द्वारा आए दिन झगड़ा फसाद पुलिस के सिर दर्द बने हुए हैं। हो भी क्यों नहीं घर घर शराब की दुकानें जो खोल दी गई हैं। महिलाओं को लुभाने के लिए घटिया सामानों का बाजार भी तेजी से पनपा है। इससे पहाड़ी संस्कृति के मर्म पर भी कहीं न कहीं चोट जरूर पहुंची है। एक समय था जब गौचर मेला मेलार्थियों के लिए तरस जाता था लेकिन बढ़ती जनसंख्या की वजह से अब भीड़ जुटनी आम बात हो गई है। इन मेलों की जान सांस्कृतिक कार्यक्रम व खेल होते हैं। कुछ सालों से इन पर भी स्तरहीन का साया चढ़ गया है। पहले तक गौचर मेले में गढ़वाल राइफल की अहम भूमिका होती थी। उनके द्वारा निशुल्क सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाने साथ ही फुटबाल व बालीवाल में प्रतिभाग करने से उनसे भिड़ने के लिए उच्चस्तर की टीमें ही हिस्सा लेती थी। तब खेलों का आनंद कुछ और होता था। अब मेले में बंद कमरों में कैरम, बैडमिंटन,चैस जैसे खेलों का आयोजन हो रहा है। फुटबाल व बालीवाल भी अंत के तीन दिनों में ही आयोजित हो रहे हैं। मेले में समुदाय विशेष के लोग भी अपनी पहचान छुपा कर खाने-पीने का करोबार धड़ल्ले से कर रहे हैं। इस बार मेले की कैंटीन भी समुदाय विशेष को दी गई थी। इस पर भी विरोध के स्वर उठने लगे हैं। व्यवसाय के हिसाब से मेले का स्वरूप चाहे जितना बदल गया हो लेकिन मां,बहन,बेटी,ननद एवं भाउज के आत्मीय मिलन का अनूठा संगम यहां आज भी बना हुआ है। यह स्वरुप लंबे समय तक बना रहेगा इससे फिलहाल किसी प्रकार के बदलाव की आशंका नहीं दिखाई देती है। लेकिन खाने पीने के क्षेत्र में बदलाव की गुंजाइश जरुर दिखाई देती है।

 

Uma Shankar Kukreti