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सारकोट: पलायन से प्रगति तक—पहाड़ का बदलता चेहरा

 

गढ़वाल हिमालय की वादियों में बसा चमोली जिले के गैरसैंण के पास स्थित सारकोट गांव आज उत्तराखंड के ग्रामीण विकास की एक जीवंत मिसाल बनकर उभर रहा है। कभी पलायन, वीरानी और बंद घरों के लिए पहचाना जाने वाला यह गांव अब उम्मीद, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है।

🔹 जब खाली हो रहे थे घर, टूट रही थी उम्मीद

कुछ साल पहले तक सारकोट की पहचान एक ऐसे गांव के रूप में थी, जहां युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके थे। पीछे रह गए थे सिर्फ बुजुर्ग और सूने घर। गांव की गलियों में सन्नाटा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता साफ दिखाई देती थी।
लेकिन हालात तब बदले, जब इस गांव को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गोद लेकर इसे आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया।

🔹 योजनाएं कागज़ से जमीन तक उतरीं

सारकोट को मुख्यमंत्री ग्रामीण पुनरोद्धार योजना के तहत चुना गया और यहां विकास सिर्फ घोषणा नहीं बल्कि धरातल पर दिखाई देने लगा।
गांव की सड़कों का सुधार
पेयजल और बिजली व्यवस्था दुरुस्त
सभी घरों को एक समान पीले रंग से सजाया गया
प्रशासनिक अधिकारियों की नियमित मौजूदगी
यह सब मिलकर गांव की तस्वीर बदलने लगे।

🔹 रोजगार की नई राह: मशरूम से आत्मनिर्भरता

सारकोट के बदलाव की असली ताकत बनी आजीविका।

यहां महिलाओं और युवाओं को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दिया गया। शुरुआत छोटे स्तर से हुई, लेकिन आज यही उत्पादन गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है।
मशरूम की सप्लाई स्थानीय बाजारों तक
बागवानी में सेब, आड़ू, बेर जैसे फलदार पौधे
बकरी पालन और दुग्ध उत्पादन
स्थानीय युवाओं का कहना है—अब गांव में ही रोजगार है, इसलिए पलायन की जरूरत नहीं।

🔹 युवा नेतृत्व की मिसाल: 21 साल की प्रधान


सारकोट की कहानी को नई दिशा देने में युवा नेतृत्व की भी बड़ी भूमिका है।
21 वर्षीय प्रियंका नेगी, जो राज्य की सबसे कम उम्र की ग्राम प्रधान बनी हैं, इस बदलाव की अगुवाई कर रही हैं

उनकी प्राथमिकता साफ है—
👉 गांव में रोजगार बढ़ाना
👉 महिलाओं को सशक्त बनाना
👉 सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू करना

🔹 आदर्श गांव की ओर बढ़ते कदम


सारकोट अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक मॉडल बन चुका है—

साफ-सफाई और एकरूपता
महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी
कृषि, पशुपालन और स्वरोजगार का संतुलन
प्रशासन और जनता के बीच बेहतर तालमेल
यहां की सफलता को देखते हुए सरकार अब ऐसे मॉडल गांव पूरे उत्तराखंड में विकसित करने की योजना बना रही है।

🔹 राजनीतिक इच्छाशक्ति + जनभागीदारी = बदलाव

सारकोट की कहानी यह साबित करती है कि योजनाएं तभी सफल होती हैं, जब उनमें राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय लोगों की भागीदारी दोनों शामिल हों।
मुख्यमंत्री स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक समन्वय ने इस गांव को नई पहचान दी है।
🌟 एक संदेश पूरे पहाड़ के लिए
सारकोट आज उन सैकड़ों गांवों के लिए प्रेरणा है, जो पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं।
यह गांव बताता है कि—
👉 सही योजना
👉 मजबूत नेतृत्व
👉 स्थानीय सहभागिता
इन तीन चीजों से पहाड़ का हर गांव अपनी किस्मत बदल सकता है।
सारकोट अब सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि उम्मीद का नाम है—जहां से पहाड़ के पुनर्जागरण की शुरुआत हो रही है।

Uma Shankar Kukreti