संस्कारों के मंच पर गूंजा शोर… DAV में ‘मासूम’ का विवाद, सिस्टम भी सवालों के घेरे में!”
देहरादून | उत्तराखंड केसरी विशेष रिपोर्ट
देहरादून के DAV PG College में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम अब पूरे प्रदेश में बहस का मुद्दा बन गया है। मंच, जिसे “शिक्षा का मंदिर” कहा जाता है, वहीं कथित तौर पर अभद्र भाषा और विवादित प्रस्तुति ने माहौल को गर्मा दिया।
कार्यक्रम में पहुंचे गायक Masoom Sharma के प्रदर्शन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि मंच से अशोभनीय शब्दों और तथाकथित “गन-कल्चर” से जुड़े गानों ने वहां मौजूद छात्रों और समाज को गलत संदेश दिया।
⚠️ सबसे बड़ा सवाल: मंच पर मौजूद जिम्मेदार लोग खामोश क्यों?
सूत्रों के अनुसार कार्यक्रम में कई जनप्रतिनिधि और वीवीआईपी मौजूद थे, लेकिन जब मंच से मर्यादा लांघी जा रही थी, तब किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया। यही चुप्पी अब जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रही है।
🚨 पुलिस एक्शन मोड में, जांच शुरू
Dehradun Police ने वायरल वीडियो का संज्ञान लेते हुए जांच शुरू कर दी है।
एसएसपी Pramendra Singh Dobal के निर्देश पर:
पूरे मामले की विशेष जांच जारी
वायरल वीडियो को सबूत के तौर पर खंगाला जा रहा
कार्यक्रम की अनुमति और शर्तों की जांच
आयोजकों से भी पूछताछ संभव
FIR दर्ज करने को लेकर अंतिम निर्णय जांच रिपोर्ट के बाद लिया जाएगा।
⚡ कार्यक्रम में हंगामा भी, छात्र घायल
इसी दौरान कार्यक्रम में छात्रों के दो गुटों के बीच झड़प भी हुई।
एक छात्र गौरव के हाथ में चोट आई
शुरुआती खबरों में चाकू हमले की बात सामने आई
लेकिन पुलिस ने स्पष्ट किया कि चोट भीड़ के दबाव में रेलिंग से टकराने से लगी
घायल छात्र को तत्काल दून मेडिकल कॉलेज में उपचार दिया गया।
🎙️ विवाद बढ़ते ही गायक ने छोड़ा मंच
स्थिति बिगड़ती देख Masoom Sharma कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर चले गए।
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि उन्होंने बाद में माफी जताई है, हालांकि इस पर आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
🔥 जनता में गुस्सा: “देवभूमि में यह कैसा कल्चर?”
स्थानीय लोगों, छात्र संगठनों और अभिभावकों में भारी नाराजगी है।
लोग सवाल उठा रहे हैं—
क्या यही उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान है?
शिक्षा संस्थानों में इस तरह के कार्यक्रमों की अनुमति क्यों?
युवाओं को क्या संदेश दिया जा रहा है?
🧭 अब नजर सरकार पर
अब सबकी नजर सरकार और प्रशासन पर है कि:
👉 क्या इस मामले में सख्त कार्रवाई होगी?
👉 क्या भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए नए नियम बनेंगे?
📌 निष्कर्ष:
यह मामला सिर्फ एक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि “संस्कार बनाम मनोरंजन” की उस बहस का है, जो आज हर शिक्षा संस्थान के सामने खड़ी है।
उत्तराखंड केसरी का स्पष्ट मत:
सार्वजनिक मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन मर्यादा और सामाजिक जिम्मेदारी उससे भी ज्यादा जरूरी है।
