Uttarakhand

*​बिथ्याणी-AMU का अकादमिक संगम: भारतीय ज्ञान परंपरा और कौशल विकास पर देशभर के शिक्षाविदों का विमर्श*

​महायोगी गुरु गोरखनाथ राजकीय महाविद्यालय बिथ्याणी और एएमयू के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम का चतुर्थ दिवस भारतीय ज्ञान परंपरा और कौशल विकास पर गहन मंथन

​विशेष संवाददाता, बिथ्याणी/अलीगढ़

​बिथ्याणी (उत्तराखंड)। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बौद्धिक संवाद और अकादमिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से महायोगी गुरु गोरखनाथ राजकीय महाविद्यालय, बिथ्याणी (यमकेश्वर, पौड़ी गढ़वाल) और प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विशेष अकादमिक कार्यक्रम अपने सफलता के शिखर पर है। इसी कड़ी में, इस सात दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम के पांचवें दिन की शुरुआत अत्यंत गरिमामयी और ऊर्जावान माहौल में हुई।

​इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समकालीन शिक्षा प्रणाली में भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) के समावेश और आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में युवाओं के कौशल विकास (Skill Development) जैसे गंभीर विषयों पर देश के प्रबुद्ध चिंतकों और शिक्षाविदों को एक साझा मंच प्रदान करना है।

​कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ और स्वागत सत्र

​कार्यक्रम के पंचम दिवस का औपचारिक प्रारंभ कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. उमेश त्यागी के संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने सभी गणमान्य अतिथियों, वक्ताओं और देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े प्राध्यापकों व शोधार्थियों का स्वागत करते हुए पांचवें दिन की रूपरेखा सामने रखी। डॉ. त्यागी ने अपने प्रारंभिक वक्तव्य में कहा कि शिक्षा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक वह हमारी जड़ों यानी हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा से न जुड़े और भविष्य की आवश्यकताओं यानी कौशल विकास को न अपनाए।

​इसके पश्चात, महायोगी गुरु गोरखनाथ राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य महोदय ने अपने स्वागत भाषण से सत्र को गति प्रदान की। उन्होंने डिजिटल और भौतिक माध्यम से जुड़े देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों के विद्वान वक्ताओं का गर्मजोशी से स्वागत किया। प्राचार्य जी ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि सुदूर पर्वतीय अंचल में स्थित इस राजकीय महाविद्यालय के छात्रों और प्राध्यापकों के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसी वैश्विक संस्था के साथ मिलकर इस प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस वैचारिक आदान-प्रदान से संस्थान के अकादमिक स्तर को एक नई ऊंचाई मिलेगी।

​डॉ. फैजा अब्बासी की गरिमामयी अध्यक्षता

​इस पूरे कार्यक्रम की अध्यक्षता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम (MMTTP) की निदेशक डॉ. फैजा अब्बासी द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. अब्बासी ने शिक्षक प्रशिक्षण और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के संदर्भ में इस तरह के आयोजनों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मालवीय मिशन का उद्देश्य ही शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण पद्धतियों के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक और व्यावहारिक विरासत से अवगत कराना है। उन्होंने दोनों संस्थानों के इस साझा प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि बिथ्याणी और अलीगढ़ का यह अकादमिक सेतु शिक्षा जगत को एक नई दिशा देगा।

​प्रथम सत्र: भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) पर वैचारिक मंथन

​कार्यक्रम का प्रथम तकनीकी सत्र पूरी तरह से ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ (IKS) पर केंद्रित रहा। इस सत्र की मुख्य वक्ता रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट (R.G.P.G.) कॉलेज, मेरठ के इतिहास विभाग की प्रख्यात प्रोफेसर डॉ. अपर्णा वत्स थीं।

​प्रोफेसर अपर्णा वत्स के संबोधन मुख्य बिंदु:

​ज्ञान का वैश्विक केंद्र रहा भारत: डॉ. वत्स ने ऐतिहासिक साक्ष्यों और वेदों, उपनिषदों के संदर्भों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि भारत अनादि काल से ही ज्ञान-विज्ञान, खगोलशास्त्र, गणित, चिकित्सा (आयुर्वेद) और धातु विज्ञान में विश्व का नेतृत्व करता रहा है।

​इतिहास की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान पीढ़ी को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर अपने वास्तविक इतिहास और प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों, दार्शनिकों के योगदान को पहचानना होगा।

​आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान का समन्वय: डॉ. वत्स ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि यह पूर्णतः तार्किक और वैज्ञानिक है। नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे भारत की शिक्षा पद्धति व्यावहारिक और जीवन मूल्यों पर आधारित थी।

​इस सत्र के अंत में प्रतिभागियों द्वारा पूछे गए जटिल प्रश्नों का डॉ. वत्स ने अत्यंत सुगमता और तार्किकता के साथ उत्तर दिया। प्रथम सत्र के समापन पर वनस्पति विज्ञान विभाग की डॉ. प्रतिभा ग्वाल द्वारा मुख्य वक्ता डॉ. अपर्णा वत्स और अध्यक्षीय मंडल के प्रति औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन (Vote of Thanks) प्रस्तुत किया गया। डॉ. ग्वाल ने विज्ञान और इतिहास के अंतर्संबंधों को जोड़ते हुए डॉ. वत्स के व्याख्यान को अत्यंत ज्ञानवर्धक बताया।

​द्वितीय सत्र: कौशल विकास (Skill Development) की अनिवार्यता

​लंच के पश्चात शुरू हुए द्वितीय तकनीकी सत्र का विषय 21वीं सदी की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘कौशल विकास’ (Skill Development) पर आधारित था। इस सत्र की मुख्य वक्ता के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के वाणिज्य विभाग (Department of Commerce) की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. शीबा हामिद उपस्थित रहीं।

​प्रोफेसर शीबा हामिद के व्याख्यान के मुख्य अंश:

​डिग्री बनाम कौशल: प्रो. शीबा हामिद ने अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए कहा कि आज के कॉर्पोरेट और व्यावसायिक जगत में केवल कागजी डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं दे सकती। युवाओं को रोजगारपरक बनाने के लिए ‘हार्ड स्किल्स’ के साथ-साथ ‘सॉफ्ट स्किल्स’, कम्युनिकेशन, डिजिटल साक्षरता और समस्या समाधान (Problem Solving) की क्षमताओं का विकास करना अनिवार्य है।

​वाणिज्य और उद्यमिता: वाणिज्य विभाग की विशेषज्ञ होने के नाते उन्होंने छात्रों को केवल नौकरी ढूंढने वाला (Job Seeker) बनने के बजाय नौकरी देने वाला (Job Creator) यानी उद्यमी बनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भारत सरकार के ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ अभियानों का संदर्भ देते हुए शिक्षा के व्यावहारिक पक्ष को रेखांकित किया।

​शिक्षकों की भूमिका: प्रो. हामिद ने प्राध्यापकों से भी अपील की कि वे अपनी पारंपरिक शिक्षण विधियों में बदलाव लाएं और कक्षाओं को अधिक संवादात्मक तथा कौशल-आधारित बनाएं।

​प्रोफेसर शीबा हामिद के इस व्यावहारिक और प्रेरणादायक व्याख्यान ने सत्र में उपस्थित सभी शोधार्थियों और प्राध्यापकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

​द्वितीय सत्र का समापन और धन्यवाद प्रस्ताव

​द्वितीय सत्र के अत्यंत सफल समापन के बाद, औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन (Vote of Thanks) की प्रक्रिया पूरी की गई। गुजरात के सूरत से विशेष रूप से इस कार्यक्रम में सहभागिता कर रहीं असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नयना जी. पटेल ने प्रो. शीबा हामिद का आभार व्यक्त किया। डॉ. पटेल ने अपने धन्यवाद भाषण में कहा कि प्रो. हामिद ने जिस तरह से वाणिज्य, शिक्षा और कौशल विकास के त्रिकोण को समझाया है, वह निश्चित रूप से सभी प्रतिभागियों के लिए भविष्य में मार्गदर्शक का कार्य करेगा। उन्होंने सूरत, गुजरात की अकादमिक बिरादरी की ओर से दोनों आयोजक संस्थानों को इस सफल और वैचारिक रूप से समृद्ध आयोजन के लिए बधाई दी।

​निष्कर्ष एवं आगामी दिवस की रूपरेखा

​कार्यक्रम का पांचवां दिन पूरी तरह से अकादमिक विमर्श, गहन चिंतन और देश के विभिन्न राज्यों (उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात आदि) के बीच सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान का गवाह बना। कार्यक्रम के अंत में संयोजक डॉ. उमेश त्यागी ने सफल संचालन के लिए तकनीकी टीम और दोनों महाविद्यालयों के प्रबंधकीय स्टाफ की सराहना की।

​इस राष्ट्रीय कार्यक्रम के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश गया है कि जब तक हमारी शिक्षा व्यवस्था अपनी प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा पर गर्व करना नहीं सीखेगी और आधुनिक दौर के कौशल विकास को आत्मसात नहीं करेगी, तब तक ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा रहेगा। छठे दिन के सत्रों में कुछ और राष्ट्रीय स्तर के नीति-निर्धारकों और शिक्षाविदों के जुड़ने की घोषणा के साथ पांचवें दिन के इस सफल बौद्धिक महाकुंभ का समापन हुआ।

Uma Shankar Kukreti