पुस्तक समीक्षा : भारतीय संसद: संविधान सदन से संसद भवन समीक्षक: प्रो. हरेन्द्र सिंह
पुस्तक समीक्षा : भारतीय संसद: संविधान सदन से संसद भवन समीक्षक: प्रो. हरेन्द्र सिंह
भारतीय लोकतंत्र की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी भारतीय संस्कृति। वैदिक गण-परिषदों से लेकर वर्तमान संसदीय व्यवस्था तक लोकतांत्रिक मूल्यों का सतत विकास भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषताओं में रहा है। व्यवस्थाएँ समय के साथ बदलती हैं, किंतु उनके मूल सिद्धांत और आत्मा अक्षुण्ण रहते हैं। जिस प्रकार नदी का प्रवाह ऋतु के अनुसार कभी मंद तो कभी प्रबल हो सकता है, किंतु उसकी दिशा और अस्तित्व बना रहता है, उसी प्रकार भारतीय लोकतंत्र भी समय की अनेक चुनौतियों के बावजूद अपने मूल स्वरूप में निरंतर प्रवाहित होता रहा है।
“भारतीय संसद: संविधान सदन से संसद भवन” नई संसद के निर्माण के बाद प्रकाशित एक महत्वपूर्ण और सामयिक पुस्तक है। लेक्सिस नेक्सिस द्वारा प्रकाशित यह कृति भारतीय संसद, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर केंद्रित एक संक्षिप्त किंतु अत्यंत उपयोगी ज्ञानकोश है। लेखक ने स्वयं इसकी आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि प्रत्येक नागरिक के लिए यह समझना आवश्यक है कि संसद किस प्रकार कार्य करती है, किस प्रक्रिया से कानून बनते हैं तथा नागरिकों की आकांक्षाओं को संसदीय विमर्श के माध्यम से किस प्रकार मूर्त रूप दिया जाता है। यही विचार इस पुस्तक को आज के समय में और अधिक प्रासंगिक बनाता है।
पुस्तक में वैदिक कालीन गणराज्यों से लेकर भारतीय संविधान के निर्माण, उसके क्रियान्वयन, संसद की शक्तियों एवं दायित्वों, विधायी और बजटीय प्रक्रियाओं, रेल बजट के इतिहास, संसदीय समितियों की भूमिका, विधायिका-न्यायपालिका संबंध, राजनीतिक दलों एवं विपक्ष की लोकतंत्र में भूमिका जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का सुव्यवस्थित और सारगर्भित विवेचन किया गया है। इन सभी विषयों का इतना संतुलित और समग्र प्रस्तुतीकरण किसी एक पुस्तक में विरले ही देखने को मिलता है।
लेखक ने संसद के कार्य-व्यवहार, उसके पदाधिकारियों के दायित्वों, संवैधानिक संस्थाओं तथा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—मीडिया—के साथ उसके संबंधों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती केवल कानूनों से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से जुड़े व्यक्तियों की निष्ठा, पारदर्शिता और संवैधानिक प्रतिबद्धता से सुनिश्चित होती है। इस संदर्भ में पुस्तक में दिए गए उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि संस्थागत मर्यादाओं की रक्षा केवल नियमों से नहीं, बल्कि उन्हें ईमानदारी से निभाने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से होती है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और संस्थाएँ एक-दूसरे के पूरक होने के साथ-साथ एक-दूसरे पर आवश्यक संवैधानिक नियंत्रण भी स्थापित करते हैं। यह संतुलन तभी संभव है जब सभी पक्ष संविधान की मर्यादा और अपनी-अपनी सीमाओं के प्रति सजग रहें। पुस्तक इस मूल भावना को अत्यंत प्रभावी ढंग से रेखांकित करती है।
लोकतंत्र और विशेष रूप से संसद पर लिखी जाने वाली किसी भी गंभीर पुस्तक में संवैधानिक न्यायशास्त्र, राजनीतिक दर्शन तथा ऐतिहासिक एवं समकालीन घटनाओं का समावेश अपेक्षित होता है। इस दृष्टि से यह कृति अत्यंत सफल कही जा सकती है। इसमें संवैधानिक सिद्धांतों और संसदीय परंपराओं का उत्कृष्ट समन्वय दिखाई देता है, साथ ही भारतीय संसदीय लोकतंत्र की उपलब्धियों और चुनौतियों पर भी संतुलित दृष्टि प्रस्तुत की गई है।
लगभग चार दशकों तक संसद की कार्यप्रणाली को निकट से देखने वाले लेखक ने सरल, स्पष्ट और अत्यंत पठनीय शैली में संवैधानिक इतिहास, संसदीय प्रक्रियाओं, मिसालों तथा वास्तविक घटनाओं का रोचक वर्णन किया है। उन्होंने संसदीय लोकाचार में आई गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए संसद को पुनः जवाबदेही की सर्वोच्च संस्था बनाने के लिए अनेक व्यावहारिक सुझाव भी दिए हैं।
लेखक का यह कथन पुस्तक का केंद्रीय संदेश बनकर उभरता है कि—
“संसद केवल ईंटों और गारे से बनी संरचना नहीं है, बल्कि राष्ट्र की सर्वोच्च प्रतिनिधि, विचार-विमर्श करने वाली और विधायी संस्था है।”
लेखक का स्पष्ट मत है कि संसद तभी प्रभावी बन सकती है जब उसमें नियमित और सार्थक चर्चाएँ हों, वर्ष में पर्याप्त बैठकें आयोजित की जाएँ तथा प्रधानमंत्री के प्रश्नकाल जैसी व्यवस्थाएँ प्रभावी रूप से लागू हों। एक सशक्त संसद ही कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित कर सुशासन का आधार बन सकती है।
प्रख्यात विद्वानों ने भी इस पुस्तक की सराहना की है। डॉ. शशि ने इसे विद्वानों और सामान्य पाठकों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी बताते हुए इसकी संक्षिप्त, सटीक और प्रभावशाली शैली की प्रशंसा की है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणि ने इसे सूचना, विश्लेषण और दूरदर्शी सुझावों से समृद्ध एक अत्यंत पठनीय कृति बताया है।
मेरे विचार में यह पुस्तक केवल छात्रों, शोधार्थियों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और विधायकों के लिए ही नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र में रुचि रखने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह न केवल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास और संवैधानिक विकास का प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करती है, बल्कि वर्तमान समय की गंभीर चुनौतियों—जैसे दल-बदल कानून की समीक्षा, छोटी राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व का संकट, प्रभावी विपक्ष का क्षरण, लोकतांत्रिक बहुलता में कमी तथा संसद के स्थान पर वैकल्पिक मंचों पर बढ़ती राजनीतिक जवाबदेही—जैसे महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को भी सामने लाती है।
यही कारण है कि यह पुस्तक केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य के लोकतंत्र पर गंभीर विमर्श का आमंत्रण भी है। संसदीय लोकतंत्र के अध्ययन, अध्यापन, शोध तथा भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को समझने की दृष्टि से यह पुस्तक निस्संदेह एक मील का पत्थर सिद्ध होगी।
