लखनऊ

कन्नौज की परफ्यूमरी धरोहर से रूबरू हुई जलागम प्रबंधन निदेशालय, देहरादून की टीम

पारंपरिक अत्तर निर्माण विधि पर विशेष शैक्षणिक अनुभव

देहरादून/कन्नौज, 2 अक्टूबर 2025।
जलागम प्रबंधन निदेशालय, देहरादून की ग्रीन-एजी परियोजना टीम ने 2 अक्टूबर 2025 को कन्नौज का शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक भ्रमण (Exposure Visit) किया। इस यात्रा का नेतृत्व डॉ. ज्योति मारवा (हिम सुरभि एरोमा म्यूजियम, मसूरी) ने किया, जबकि औद्योगिक क्षेत्र से श्री धीरेंद्र दुबे (ओम एरोमा) ने विशेष मार्गदर्शन प्रदान किया।

प्रतिभागियों में निदेशालय से श्री उपेंद्र रावत (बायोडायवर्सिटी विशेषज्ञ), सुश्री गीता रावत (जेंडर एवं सोशल एक्सपर्ट), श्री रजनीश सिंह (उन्नतिशील कृषक, पौड़ी) तथा सुश्री सविता रमोला (सामाजिक कार्यकर्ता, सेंदुल) शामिल रहे।

टीम ने कन्नौज के दो प्रमुख संस्थानों — Fragrance and Flavour Development Centre (FFDC), मकरंदनगर और मुन्‍नालाल एंड सन्‍स हेरिटेज हाउस — का भ्रमण किया। ये दोनों संस्थान प्राकृतिक सुगंध और अत्तर निर्माण की प्राचीन कला के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए प्रसिद्ध हैं।

इस exposure visit का विशेष आकर्षण मेहंदी (हेना) अत्तर निर्माण की पारंपरिक ‘देग-भापका’ तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव रहा। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों की देखरेख में ताज़ी मेहंदी पत्तियों को देग (तांबे के पात्र) में भरने से लेकर भापका (Receiver Vessel) जोड़ने और जोड़ो को मिट्टी से सील करने तक की संपूर्ण तैयारी स्वयं की। यद्यपि वास्तविक आसवन प्रक्रिया (Distillation) नहीं की गई, किंतु सम्पूर्ण अनुभव सभी प्रतिभागियों के लिए अत्यंत स्मरणीय रहा।

इस अवसर पर डॉ. ज्योति मारवा ने कहा —
“यह यात्रा हमारे प्रतिभागियों को परफ्यूमरी की जीवित धरोहर से जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित की गई। देग-भापका तकनीक का प्रत्यक्ष अनुभव प्रतिभागियों के लिए अविस्मरणीय रहा, जिसने कन्नौज की परंपरा को जीवंत कर दिया।”

श्री धीरेंद्र दुबे ने कहा —
“ऐसे exposure visit पारंपरिक कारीगरों और आधुनिक उद्यमियों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करते हैं। इससे भारतीय सुगंध विरासत आज की दुनिया में भी जीवित रहेगी।”

इस दौरान सुश्री ज्योति मारवा के मार्गदर्शन में इंटर्न रह चुके सुभाष राय ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 2024 में मसूरी फ्रेगरेंस एवं फ्लेवर्स संस्थान में इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने बाँस (Bamboo) की डिस्टिलेशन तकनीक पर कार्य किया। उनकी रिसर्च में बाँस की पत्तियों में पाए जाने वाले सिलिका और बायोटिन जैसे अवयव त्वचा एवं बालों की देखभाल में उपयोगी सिद्ध हुए। इसके लिए उन्हें 10 लाख रुपये की अनुदान राशि भी प्राप्त हुई है और अब वे वैशाली (बिहार) में ‘देग-भापका’ इकाई स्थापित करने की योजना पर कार्यरत हैं।

जलागम प्रबंधन निदेशालय की ग्रीन-एजी टीम ने इस exposure visit को अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभव बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि उत्तराखंड में सुगंध एवं अत्तर उद्योग की संभावनाओं को ग्रामीण आजीविका और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने में इस प्रकार की पहलें सहायक सिद्ध होंगी।

कन्नौज की यह यात्रा प्रतिभागियों के लिए न केवल सीखने का अवसर बनी, बल्कि भारत की प्राचीन अत्तर परंपरा को गहराई से समझने और सराहने का भी अनूठा अनुभव प्रदान कर गई।

 

Uma Shankar Kukreti