पहाड़ से लोगों का ही नहीं, संस्कृति का भी पलायन

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ढोल-दमाऊं उपेक्षित, मशकबीन नदारद
– बरातियों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की तादाद अधिक
पहाड़ की एक शादी का लाइव चित्रण

  पौड़ी गढ़वाल- गत दिनों पौड़ी गढ़वाल स्थित अपने ननिहाल बमोली गांव शादी में गया। लंबे समय के बाद शादी में गया था। मन में लड्डू फूट रहे थे कि पंगात में बैठ कर खुस्का और पीली दाल खाऊंगा। 22 नवम्बर को दिन ढले ननिहाल पहुंचा। उस दिन न्यूतेर यानी मेहमानों की आवभगत होनी थी। मैं जब पंडाल में पहुंचा तो वहां टेबल पर काले उबले-भुने हुए चने, नमकीन और प्लास्टिक के कुछ गिलास शराब से भरे थे। पुरुष जिनमें नौजवान, युवा और बुजुर्ग शामिल थे, गटागट दारू पी रहे थे। मैं दारू न पीने के अपराधबोध से ग्रस्त होकर एक कोने में पड़े स्टील के कैंपर से अपने लिए चाय निकालता हूं। थोड़े से चने भी ले लेता हूं और फिर एक कोने में सिमट जाता हूं। ठहाके मेरे कानों से टकरा रहे थे, लेकिन मैं चुपचाप गांव की पुरानी शादियों को याद करने लगता हूं। पुरानी शादियों में शराब और कबाब का बोलबाला नहीं था। पेपर प्लेट में थोड़ी नमकीन, बिस्कट, मिठाई का एक पीस और छोटा समोसा होता था। चाय के साथ मेहमानों को सर्व किया जाता था। गांव में युवा मंगल दल होता था, जो ये काम करता था। अब ऐसा कुछ भी नहीं है। टैंट और केटर ने यह जगह ले ली। ढोल-दमाऊं की थाप सुनना चाहता था लेकिन इसकी बजाए डीजे ने जगह ले ली। चैता की चैत्वाली और प्वां बागा रे की धुन पर महिलाओं को थिरकते देख मैंने बेहतर समझा कि सफर की थकान मिटा ली जाए। मैंने बुफू स्टाइल में खाना खाया और अपने ममेरे भाई रवि के घर जाकर सो गया।

दिन की शादी समय की बचत या मजबूरी?

पहाड़ में विगत कुछ वर्षों से दिन की शादियां होती हैं। पहले रात को बरात पहुंचती थी और दूसरे दिन दुल्हन की विदाई होती थी। लेकिन अब शादी दिन में ही होने लगी है। महिलाएं कहती हैं कि अब शराब का बड़ा जोर है। सब शराबी हैं। रात को उनकी जिम्मेदारी न मेजबान ले सकते हैं और न ही बराती। रात को झगड़ा होने की आशंका भी होती है, इसलिए अब दिन की शादी को ही महत्व दिया जाता है।

बैंड ने ले ली ढोल-दमाऊं की जगह

दूसरे दिन लगभग 12 बजे बरात आई। बरात में पुरुष कम महिलाएं अधिक थी। कारण, पलायन के चलते अब पहाड़ में पुरुष हैं ही नहीं। थापला का बैंड था। बैंड में आठ-दस नौजवान थे। बरात के स्वागत के लिए मेजवान के ढोल-दमाऊं वाले भी थे और बरात के साथ आए ढोल-दमाऊं वाले भी। बिना मशकबीन के बरात कुछ अटपटी लगी। स्वागत गेट पर मुश्किल से पांच-सात मिनट ढोल बजा होगा। इसके बाद बैंड वालों ने मोर्चा संभाल लिया और बराती ढोल-दमाऊं वालों के चेहरे से बेखबर बैंड की धुन पर नाचते रहे। बरातियों के साथ आए ढोल-दमाऊं वालों ने अपने बाजे एक तरफ रख दिये तो घराती ओर से ढोल-दमाऊं वादक बैंड पर थिरकते लोगों को चुपचाप देखते रहे। मैंने ढोल वादक के चेहरे पर उदासी पढ़ ली और उसके अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया। सच, बड़ा बुरा महसूस हुआ। मैं जो गांव की शादी में देखने आया था, वह सपना चकनाचूर हो रहा था।

बुफे स्टाइल लंच से दिल टूट गया

दोपहर में जब मैंने टेबल पर खाना सजा देखा तो झटका लगा। उससे भी अधिक झटका यह कि खुस्का और पीली दाल कहीं नजर नहीं थी। न ही दाल की भूड़ी यानी पकोड़ी। हलवे की जगह कनस्तर के नकली रसगुल्ले देख रहा-सहा रोमांच भी खत्म हो गया। पहले शादी में पंगत बैठती थी और सरूल यानी खाना पकाने वाला सबको खिलाता था। मालू के पत्तों में भोजन परोसा जाता था। खुस्का यानी मीठे चावल के साथ अरहर या उड़द की दाल पत्तलों में डाली जाती थी। दाल जमीन की ओर बहने लगती तो उसे बटोरना-संभालना, पत्ते को मोड़ना सब अच्छा लगता। अब सब बीता जमाना सा हो गया है। लगता है कि पहाड़ से लोगों का पलायन होने के साथ ही संस्कृति का भी पलायन हो गया है।

गुणानंद जखमोला जी की फेसबुक वाल से साभार

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