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इस दीपावली मिट्टी के दीये जलाएँ : परंपरा, संस्कृति और पर्यावरण की पुकार

- डॉ प्रियंका सौरभ
– डॉ प्रियंका सौरभ

दीपोत्सव पर मिट्टी के दीये जलाना हमारी संस्कृति की पहचान, कुम्हारों की आजीविका का सहारा और पर्यावरण संरक्षण का सरल उपाय है।

दीपावली का वास्तविक स्वरूप मिट्टी के दीयों की पवित्र रोशनी में छिपा है। आधुनिकता की आंधी में इलेक्ट्रॉनिक लाइटें और पटाखे हमारी परंपरा, संस्कृति और पर्यावरण पर बोझ बन गए हैं। मिट्टी के दीये न केवल प्रदूषण मुक्त हैं, बल्कि कुम्हारों की आजीविका से भी जुड़े हैं। दीयों की मंद-मंद लौ हमें सादगी, विनम्रता और भाईचारे का संदेश देती है। इस दीपावली हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि पटाखों से दूर रहकर केवल मिट्टी के दीयों से घर-घर रोशन करेंगे। यही सच्चा दीपोत्सव होगा—जहाँ उजाला केवल घरों में ही नहीं, दिलों में भी फैले।

– डॉ प्रियंका सौरभ

भारत विविधताओं और परंपराओं का देश है। यहाँ हर त्यौहार केवल उत्सव नहीं होता, बल्कि उसमें सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संदेश छुपा होता है। दीपावली, जिसे “दीपों का पर्व” कहा जाता है, अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और बुराई से अच्छाई की ओर बढ़ने का प्रतीक है। यह पर्व भगवान राम की अयोध्या वापसी की स्मृति में मनाया जाता है, जब नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। तभी से कार्तिक अमावस्या को दीप जलाने की परंपरा प्रारंभ हुई।

लेकिन बदलते समय के साथ दीपावली का स्वरूप भी बदल रहा है। अब घरों में मिट्टी के दीयों की जगह बिजली की झालरों और रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने ले ली है। पटाखों का शोर और धुआँ वातावरण को दूषित कर रहा है। परंपराओं से विमुख होने के कारण न केवल हमारी संस्कृति पर संकट है बल्कि पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में आवश्यकता है कि हम अपने मूल स्वरूप की ओर लौटें और इस दीपावली मिट्टी के दीयों को जलाने का संकल्प लें।

दीयों की परंपरा भारत में आदि काल से रही है। दीपक केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। सरसों के तेल के दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और यह धार्मिक दृष्टि से भी शुभ माना गया है। मिट्टी के दीये केवल धार्मिक वस्तु नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का जीवंत हिस्सा हैं। यह साधारण-सा दीया जब जलता है तो उसमें अपार आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश छुपा होता है। दीपक विनम्रता और सादगी का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि छोटी-सी लौ भी अंधकार को मिटा सकती है। मिट्टी के दीयों की रोशनी आँखों को आराम पहुँचाती है, जबकि कृत्रिम लाइटें कई बार आँखों और त्वचा के लिए हानिकारक साबित होती हैं। दीयों से निकलने वाली हल्की गर्माहट वातावरण को शुद्ध करने में मदद करती है।

पिछले दो दशकों में दीपावली का स्वरूप काफी बदल गया है। शहरों और गाँवों में लोग घर सजाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक झालरों, LED लाइटों और चमकीली सजावट का सहारा लेने लगे हैं। इन लाइटों से कुछ क्षण के लिए तो घर जगमगा उठते हैं, परंतु इसमें वह सांस्कृतिक और भावनात्मक गहराई नहीं है जो मिट्टी के दीयों से जुड़ी होती है। इसी प्रकार पटाखों का चलन दीपावली को प्रदूषण का त्यौहार बना रहा है। तेज आवाज से ध्वनि प्रदूषण, धुएँ से वायु प्रदूषण और रासायनिक प्रदूषकों से स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ रहा है। इससे साँस के रोग, आँखों में जलन और त्वचा की समस्याएँ बढ़ रही हैं। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक होती है।

दीयों के महत्व का एक सामाजिक पहलू भी है। मिट्टी के दीये बनाने वाला कुम्हार समाज पीढ़ियों से इस परंपरा से जुड़ा हुआ है। एक समय था जब दीपावली से महीनों पहले लोग कुम्हारों को ऑर्डर देते थे और उनके घरों में दिन-रात चाक घूमता था। पूरा परिवार दीये बनाने और सजाने में जुटा रहता था। लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक लाइटों के प्रचलन और दीयों की घटती मांग ने इस समाज को हाशिए पर पहुँचा दिया है। उनकी आय का मुख्य साधन समाप्त होता जा रहा है। कई कुम्हार अपने पुश्तैनी धंधे को छोड़कर मज़दूरी या दूसरे काम करने लगे हैं। यदि हम दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाएँ तो न केवल पर्यावरण और परंपरा की रक्षा करेंगे बल्कि कुम्हारों को भी आर्थिक सहारा मिलेगा। यह ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को भी सशक्त करेगा।

मिट्टी के दीये पर्यावरण के अनुकूल हैं। इनमें न तो बिजली की खपत होती है और न ही रसायनों का उपयोग। ये पूरी तरह प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल होते हैं। दीयों के तेल से मच्छर और कीड़े-मकोड़े दूर होते हैं। इनमें से निकलने वाला धुआँ हानिकारक नहीं होता। बिजली से चलने वाली झालरों में प्लास्टिक, धातु और केमिकल का प्रयोग होता है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। पटाखों की तुलना में दीये जलाना बिल्कुल प्रदूषण-मुक्त है। यदि हर परिवार पटाखों की जगह केवल दीये जलाने का संकल्प ले, तो यह पर्यावरण बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

आज की युवा पीढ़ी फैशन और आधुनिकता के आकर्षण में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों की ओर अधिक झुक रही है। लेकिन संस्कृति और परंपरा का निर्वहन करना युवाओं की ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि युवा वर्ग मिट्टी के दीयों के महत्व को समझे और अपने घरों को दीयों से सजाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी इस परंपरा को याद रखेंगी। युवाओं को यह समझना होगा कि दीपावली केवल सजावट और शोर-शराबे का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, सद्भावना और एक-दूसरे के साथ खुशी बाँटने का अवसर है।

हमारी संस्कृति में दीपावली केवल घर सजाने या पटाखे चलाने का त्यौहार नहीं है। यह अच्छाई की जीत, ज्ञान का प्रकाश और भाईचारे का संदेश है। असली दीपावली तब होगी जब हर घर में मिट्टी के दीये जलें, लोग मिठाइयाँ और पकवान बनाकर अपने पड़ोसियों व मित्रों के साथ बाँटें, उपहारों में केवल दिखावा न हो, बल्कि स्नेह और अपनापन हो, और गरीब, असहाय और वंचित वर्ग के घरों में भी उजाला पहुँचे।

सबके पास उजाले हो,
मानवता का संदेश फैलाते,
मस्जिद और शिवाले हो।

नीर प्रेम का भरा हो सब में,
ऐसे सब के प्याले हो।
होली जैसे रंग हो बिखरे,
दीपों की बारात सजी हो,
अंधियारे का नाम न हो,
सबके पास उजाले हो।

हो श्रद्धा और विश्वास सभी में,
नैतिक मूल्य पाले हो।
संस्कृति का करे सब पूजन,
संस्कारों के रखवाले हो।

भूख, गरीबी, आतंक मिटे,
न देश में धंधे काले हो।
सच्चाई को मिले आज़ादी,
लगे झूठ पर ताले हो।

झोंपड़ियों के आंगन में भी,
खुशियों की फैली डाले हो।
‘जिए और जीने दे’ सब
हर दिल में भाईचारा पाले हो।

दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर, पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक सामंजस्य का उत्सव है। यदि हम इस दीपावली मिट्टी के दीये जलाएँ, पटाखों से दूर रहें और अपनी परंपरा को पुनर्जीवित करें, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा। आइए, इस दीपावली हम सभी मिलकर मिट्टी के दीयों से घर-घर रोशन करें, कुम्हारों के चेहरे पर मुस्कान लाएँ और पर्यावरण को बचाने का संकल्प लें। यही असली दीपोत्सव होगा—जहाँ उजाला केवल घरों में ही नहीं, बल्कि दिलों में भी फैले।

Uma Shankar Kukreti