सीबीआई जांच की ओर बढ़ रहा दौलतराम ट्रस्ट की 700 बीघा जमीन का मामला
हाईकोर्ट में CBI ने मांगा दो सप्ताह का समय, 20 अगस्त की सुनवाई पर टिकी निगाहें
देहरादून। देहरादून के माजरा क्षेत्र स्थित दौलतराम ट्रस्ट की करीब 700 बीघा भूमि से जुड़े बहुचर्चित मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अब मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को होगी।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता रीता सूरी एवं अन्य की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा गया। राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता अक्षय लटवाल तथा सीबीआई की ओर से अधिवक्ता सौरव अधिकारी अदालत में उपस्थित रहे।
सीबीआई के अधिवक्ता ने मामले में प्रतिशपथ पत्र (काउंटर एफिडेविट) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। अदालत ने समय प्रदान करते हुए मामले को इससे जुड़े अन्य प्रकरणों के साथ 20 अगस्त 2026 के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
वर्षों पुराना मामला फिर चर्चा में
माजरा स्थित दौलतराम ट्रस्ट की भूमि से जुड़े कथित अनियमितताओं और अतिक्रमण का मामला लंबे समय से विभिन्न न्यायिक मंचों पर उठता रहा है। याचिकाकर्ता रीता सूरी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि इस मामले को सबसे पहले उनके भाई एवं अधिवक्ता राजेश सूरी ने उठाया था।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, वर्ष 2007 में संबंधित मामले में क्लेमेंटटाउन थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और इससे संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर न्यायालय में समय-समय पर सुनवाई होती रही।
भाई की मौत के बाद बहन ने संभाली कानूनी लड़ाई
रीता सूरी की ओर से जारी बयान में आरोप लगाया गया है कि उनके भाई अधिवक्ता राजेश सूरी की 30 नवंबर 2014 को कथित तौर पर जहर देकर हत्या कर दी गई थी। उनका कहना है कि भाई की मृत्यु के बाद उन्होंने न्यायालय से संबंधित मामलों में स्वयं पैरवी करने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार किया गया।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का पक्ष इस सामग्री के साथ उपलब्ध नहीं है और इनका अंतिम सत्यापन न्यायालयी प्रक्रिया का विषय है।
2020 में गठित हुई थी SIT
प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि उत्तराखंड शासन ने 8 जून 2020 को तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अरुण मोहन जोशी के नेतृत्व में एसआईटी गठित की थी। एसआईटी को मामले की जांच कर रिपोर्ट शासन को सौंपने के निर्देश दिए गए थे।
याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी थी, लेकिन उस पर अंतिम निर्णय लंबे समय तक लंबित रहा। आरटीआई के माध्यम से मांगी गई जानकारी में भी रिपोर्ट शासन के विचाराधीन होने की बात सामने आने का दावा किया गया है।
CBI जांच की मांग
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई है। याचिका में विशेष रूप से सीबीआई से जांच कराने का अनुरोध किया गया है।
अब इस मामले में 20 अगस्त 2026 की सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस दिन सीबीआई की ओर से जवाब दाखिल किया जाना है। इसके बाद मामले में आगे की न्यायिक दिशा को लेकर तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
उत्तराखंड केसरी की नजर इस मामले की अगली सुनवाई पर रहेगी।
नोट: इस खबर में याचिकाकर्ता/वादिनी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में लगाए गए आरोपों को आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। आरोपों की सत्यता पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा किया जाना है। संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया उपलब्ध होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
