चौखम्बा की तलहटी में,मन्दानी नदी के किनारे स्थित मनणा माई के दरबार में जो व्यक्ति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है!ऊखीमठ से वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मण सिंह नेगी की रिपोर्ट

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ऊखीमठ! मदमहेश्वर घाटी के पर्यटक गाँव रासी से लगभग 32 किमी दूर चौखम्बा की तलहटी में,मन्दानी नदी के किनारे″ व प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसा मनणा माई तीर्थ के दर्शन करने से इस कलियुग में अखिल कामनाओं व अर्थों की पूर्ति होती है! मनणा माई के दरबार में जो व्यक्ति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है! मनणा माई को भेड़ पालको की अराध्य देवी माना जाता था मगर धीरे – धीरे भेड़ पालन व्यवसाय कम होने के कारण वर्तमान समय में रासी गाँव के ग्रामीण अपनी अराध्य देवी की पूजा – अर्चना करते है! बरसात के दिनों में रासी गाँव से मनणा माई तीर्थ तक पांच दिवसीय 32 किमी लोक जात यात्रा का आयोजन किया जाता है,

इस लोक जात यात्रा में शामिल होने का सौभाग्य भगवती मनणा माई की इच्छा के अनुसार ही प्राप्त हो पाता है ! भगवती मनणा की यात्रा आस्था व रोमांच से भरी है! कालीमठ घाटी के चौमासी गाँव तथा केदारनाथ धाम से भी मनणा धाम पहुंचा जा सकता है! भगवती मनणा माई की महिमा का वर्णन महाकवि कालिदास ने भी गहनता से किया है! वेद पुराणों में वर्णित है कि सतयुग में देवताओं व दैत्यों में घमासान युद्ध हुआ ,कई दैत्य देवताओं के वरदान के कारण अन्य देवताओं पर हावी होते गये , कई दिनों तक चले युद्ध के बाद भी देवता दैत्यों का वध नहीं कर सके! महिषासुर दैत्य को भी भगवान शंकर के द्वारा वरदान दिया गया था कि यदि युद्ध के समय तू हिमालय पर्वत का स्पर्श करेगा तो विश्व में अमर हो जायेगा!

देवताओं व दैत्यों के संग्राम में जब अधिकांश दैत्यों का वध हो चुका था तो महिषासुर दैत्य देवताओं की डर से सिद्ध पीठ काली शिला से होते हुए हिमालय की ओर अग्रसर होते देख भगवती काली आश्चर्यचकित हो गयी! भगवती काली ने मन ही मन सोचा कि यदि महिषासुर दैत्य के द्वारा हिमालय को स्पर्श किया गया तो वह हमेशा के लिए अमर हो जायेगा इसलिए देवताओं के कल्याण के लिए भगवती काली ने महिषासुर दैत्य का पीछा किया, महिषासुर दैत्य इतना बलशाली था कि वह भगवती काली से कई कोस दूर हिमालय की ओर अग्रसर होता गया, भगवती काली महिषासुर दैत्य का पीछा करने में असमर्थ रही! भगवती काली महिषासुर दैत्य का पीछा करती रही मगर थकने के कारण महिषासुर दैत्य हिमालय की ओर बढता ही जा रहा था , महिषासुर दैत्य जब मनणा के बुग्यालों में पहुंचा तो वहाँ से हिमालय कुछ ही दूरी पर था इसलिए भगवती काली ने अपनी योगमाया से मनणा के बुग्यालों के भूभाग को दल – दल में तब्दील कर दिया तथा महिषासुर दैत्य हिमालय की ओर अग्रसर होने के बजाय दल- दल में धसता गया! भगवती काली के मनणा के बुग्यालों में पहुंचने पर भगवती काली ने महिषासुर दैत्य का वध किया तथा विश्व कल्याण व क्षेत्र की खुशहाली के लिए मनणा के बुग्यालों में तपस्यारत हो गयी तब से भगवती काली का दूसरा स्वरूप मनणा माई के रुप में पूजित हो गया तथा मनणा के बुग्याल मनणा धाम से विख्यात हो गये! लोक मान्यताओं के अनुसार भगवती मनणा माई सतयुग से इस तीर्थ में जगत कल्याण के लिए तपस्यारत है! आज से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व भेड़ पालक छ; माह प्रवास के लिए सनियारा,पट्णी,, शीला समुद्र व मनणा के बुग्यालों में जाते थे तो भेड़ पालको द्वारा भगवती मनणा माई की पूजा – अर्चना की जाती थी, धीरे – धीरे मनणा माई भेड़ पालको की अराध्य देवी बन गयी! भेड़ पालको की जब भी वापसी होती तो वे भगवती मनणा माई के निशाणो को साथ लाते तथा बुग्यालों में पुनः जाने पर भगवती मनणा माई के निशाण भी अराध्य देवी के रुप में पूजित रहते, : समय चक्र के अनुसार भेड़ पालन व्यवसाय कम होता गया तो भेड़ पालको ने भगवती मनणा माई की डोली को भगवती राकेश्वरी के मन्दिर में विराजमान किया तथा तब से लेकर आज तक रासी गाँव के ग्रमीणो व हक – हकूकधारियो द्वारा भगवती राकेश्वरी सहित भगवती मनणा माई की पूजा व अन्य परम्पराओं का निर्वहन किया जा रहा है! स्थानीय मान्यताओं के अनुसार आज भी सावन मास में रासी गाँव से पांच दिवसीय मनणा माई लोक जात यात्रा का आयोजन किया जाता है तथा भगवती मनणा माई की डोली राकेश्वरी मन्दिर रासी से परम्परानुसार धाम के लिए रवाना होती है तथा डोली के धाम से रासी गाँव पहुंचने पर मनणा माई लोक जात का समापन होता है! इस लोक जात में वही भक्त शामिल हो पाता है जिस पर भगवती मनणा माई की असीम कृपा हो! मान्यताओं के अनुसार मनणा धाम में मन्दिर के पृष्ठ भाग में महिषासुर दैत्य की विशाल शीला है तथा मनणा माई की पूजा से पहले महिषासुर दैत्य की पाषाण शिला की पूजा की परम्परा है! महिषासुर दैत्य की पाषाण शिला की पूजा के बाद पाषाण शिला को घास से ढकने के बाद मनणा माई की पूजा का विधान है! मदमहेश्वर घाटी के रासी गाँव से सनियारा, पटूडी थौली, दूफान,शीला समुद्र, कुलवाणी,सुरम्य मखमली बुग्यालों के रास्ते मनणा धाम पहुंचा जा सकता है!

 

सनियारा से मनणा माई धाम तक के भूभाग को प्रकृति ने नव नवेली दुल्हन की तरह सजाया व संवारा है! वर्षा व शरद ऋतु में सैकड़ों प्रजाति के रंग – बिरंगे पुष्प व दुर्लभ जडी- बूटियां हर किसी को आकर्षित करती है! मनणा माई के धाम तक का पैदल मार्ग सुरम्य मखमली बुग्यालों से भरपूर होने के साथ – साथ प्राकृतिक सौन्दर्य व आध्यात्मिकता से भी जुड़ा हुआ है! सनियारा से लेकर मनणा माई धाम तक फैले भूभाग की नैसर्गिक छटा अद्वितीय है! जो प्रकृति का रसिक यहाँ घड़ी भर के लिए पहुंचता है वह जीवन के दुख – दर्दो को भूलकर यहाँ के प्राकृतिक सुंदरता का कायल हो जाता है, चन्द्रमा अस्त व सूर्योदय विहंगम दृश्य इस भूभाग से एक साथ देखा जा सकता है! मनणा माई धाम के चारों तरफ हरी- भरी वादियाँ, मखमली चारागाह, झरने, मन्दानी नदी की कल – कल आवाज, निर्भीक उछलकूद करते जीव – जन्तु प्रकृति प्रेमियों के लिए आनन्द व रोमाच का विषय बन जाते है! सनियारा से मनणा माई धाम के बुग्यालों में वर्षा व शरद ऋतु में जय – विजय कुखडी,माखूडी,कुषण,किरमोला, अतीस, कुटगी,हत्ताजडी , जटामांसी, ब्रह्म कमल, फलपंजा, बारुण हल्दी, बालसिधी, इन्द्रायणी, रातो की रानी, कचूर, कचरी, दौलू,आरचा,शतावरी सहित अनेक प्रजाति कि जडी- बूटियों से सुसज्जित है, लोक मान्यता है कि अमावस्या को रात्रि के समय ये जडी़ – बूटियां बिजली की तरह स्वयं ही प्रकाशमान हो जाती है! मनणा माई धाम के तीर्थ पुजारी भगवती प्रसाद भटट् बताते है कि भगवती मनणा माई की तीर्थ महिमा व उस तीर्थ के प्राकृतिक सौन्दर्य की महिमा का गुणगान जितना भी किया जाय वह बहुत कम है, उन्होंने कहा कि भगवती मनणा माई इस कलिकाल में प्रत्यक्ष फल देने वाली है! केदारनाथ धाम के तीर्थ पुरोहित माधव कर्नाटकी, प्रकृति प्रेमी रवींद्र रावत, लखपत राणा, मनोज पटवाल,देवानन्द गैरोंला इं0के के बिष्ट बताते हैं कि जब तक भगवती मनणा माई की असीम कृपा न हो तब तक मनणा माई धाम पहुंचना आसान नहीं है! उनका कहना है कि मनणा माई धाम की यात्रा अदम्य साहस व भगवत कृपा से ही की जा सकती है!सच्चे मन से जो भी इस यात्रा में शामिल होते हैं उन्हें मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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