मिलिए तराई की सुपरमॉम से जिसके पेट में शिकारियों का फंदा और कंधे पर तीन शावकों को पालने की ज़िम्मेदारी,
पीलीभीत। तराई के समूचे इलाके को ही बाघों के लिए स्वर्ग सा माना जाता है. लेकिन वन महकमे की खामियों का फायदा उठाकर शिकारी अपनी करतूतों से इस स्वर्ग को भी नर्क में तब्दील कर देते हैं. इसका जीता जागता उदाहरण है पीलीभीत उत्तराखंड सीमा पर सुरई रेंज की एक बाघिन, जो पिछले 7 वर्षों से शिकारियों के दिए जख्म के साथ जी रही है. वहीं अब ऐसी संभावना है कि शायद इस बाघिन को ताउम्र ऐसे ही रहना पड़े.
दरअसल तराई के खूबसूरत जंगल शिवालिक गंगेटिक प्लेन्स क्षेत्र के अंतर्गत आता है, तराई के ये जंगल अपने विशेष भारी भरकम बाघों के लिए जाना जाता है. कॉर्बेट हो या फिर पीलीभीत टाइगर रिजर्व, पर्यटन सत्र के दौरान यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है. अगर पीलीभीत टाइगर रिजर्व की बात करें तो यह अभ्यारण्य नेपाल की शुक्लाफांटा सेंचुरी व उत्तराखंड के पूर्वी तराई वन प्रभाग की सुरई रेंज से सीमा साझा करती है. अगर सुरई रेंज की बात करें तो यह रेंज विभाजन से पहले पीलीभीत वन प्रभाग का हिस्सा हुआ करती थी. लेकिन उत्तराखंड विभाजन के साथ ही साथ जंगल भी दो भागों में बंट गया. जंगल की सीमा का भले ही विभाजन हो गया हो, लेकिन सरकारों की बनाई इस सीमा के फेर में वन्यजीव नहीं आते. दोनों रेंजों के वन्यजीव समूचे जंगल में ही स्वछंद विचरण करते हैं.
7 साल पहले पेट में फंसा था फंदा
दरअसल बीते वर्ष जनवरी के महीने में मशहूर बॉलिवुड अभिनेता ने एक तस्वीर शेयर की थी जिसमें एक बाघिन के पेट में शिकारियों का फंदा फंसा दिखाई दे रहा था. मामले ने फौरन ही तूल पकड़ लिया और शासन स्तर से इस मामले में त्वरित एक्शन के निर्देश दिए गए. शुरुआती जांच पड़ताल में सामने आया कि 8-10 वर्ष के बीच उम्र की एक बाघिन के पेट में शिकारियों द्वारा लगाया गया फंदा (क्लच वायर) फंसा हुआ है. जांच में यह भी सामने आया कि यह फंदा लगभग वर्ष 2018 में फंसा था ऐसे में यह उसकी खाल में बैठ गया था. जिसे निकालने के लिए बाघिन को कुछ दिन चिकित्सकों की देखरेख में रखा जाना आवश्यक है. जनवरी 2024 में ही बाघिन के रेस्क्यू को लेकर कवायद शुरु कर दी गई थी. लेकिन ऑपरेशन के दौरान ही बाघिन के साथ उसके नवजात शावक भी देखे गए ऐसे में रेस्क्यू ऑपरेशन को फौरन स्थगित कर दिया गया. बताते हैं कि यह फंदा फंसने के बाद से बाघिन ने 2 बार शावकों को जन्म दे कर उन्हें पाला. बहरहाल शावकों के देखे जाने के बाद जानकारों का मानना था कि शावकों के अपनी मां से अलग हो जाने से पहले उसे रेस्क्यू करना शावकों की जान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. तब से अब तक बाघिन व शावकों की निगरानी के लिए 24 ट्रैप कैमरा लगाए गए हैं. जिसमें बाघिन व शावक पूर्ण रूप से स्वस्थ पाए जा रहे हैं. अब शावकों की उम्र 18-20 महीनों के बीच हो गई है. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद अब इस बाघिन को शिकारियों के फंदे से निजात मिल सके. मगर विभागीय सूत्रों की मानें तो बाघिन को लगभग ताउम्र ही इस फंदे के साथ जीना पड़े. विभागीय उच्चाधिकारी बाघिन के स्वस्थ होने का हवाला दे कर, उसके प्राकृतिक व स्वछंद विचरण में व्यवधान न करने की बात कह रहे हैं.
रीढ़ को क्षतिग्रस्त कर देगा फंदा
बाघिन के वायरल फोटो व वीडियो के आधार पर जानकारी देते हुए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में वन्यजीव पशुचिकित्सा विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पराग निगम ने बताया कि भले ही यह फंदा फंसे होने के बावजूद भी बाघिन स्वस्थ नजर आ रही है मगर समय बीतने के साथ यह बाघिन के लिए घातक साबित हो जाएगा, अगर समय रहते इसे नहीं निकाला गया तो यह बाघिन की रीढ़ की हड्डी को भी क्षतिग्रस्त कर सकता है.
शिकारियों के रडार पर तराई
गौरतलब है कि बाघिन के निचले हिस्से में फंसा क्लच वायर (फंदा) वन विभाग के पहरे में शिकारियों की सेंध का जीता जागता प्रमाण है. तराई के दुधवा व पीलीभीत के जंगल तो टाइगर रिजर्व घोषित होने के चलते काफी हद तक सुरक्षित हैं, मगर सीमा साझा करते उत्तराखंड के जंगलों में शिकारी सक्रिय हैं जो कि पीलीभीत टाइगर रिजर्व के लिए नासूर साबित हो सकते हैं. हालांकि यह बाघिन इतने कष्टमय हालातों में भी अपने शावकों को सफलतापूर्वक बड़ा कर चुकी है यह भी मातृत्व की जीती जागती मिसाल है. पूरे मामले पर अधिक जानकारी देते हुए पूर्वी तराई वन प्रभाग की सुरई रेंज अधिकार राजेन्द्र सिंह मनराल ने बताया कि उच्चाधिकारियों के निर्देशानुसार बाघिन की निगरानी के लिहाज से टीमों के साथ ही 24 ट्रैप कैमरा डिप्लॉय किए गए हैं. जिसमें बाघिन व शावक पूर्ण रूप से स्वस्थ नजर आ रहे हैं. मुख्यालय स्तर पर भी बाघिन की मॉनीटरिंग की जा रही है. इस संबंध में उच्चाधिकारियों की ओर से निर्णय लिया जाना है.
