स्वतः संज्ञान लेकर मुख्यमंत्री के खिलाफ फैसला लेने का व्यापक असर हो सकता था-कानून विशेषज्ञ

देहरादून 31 अक्टूबर, 2020। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीबीआइ जांच के हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट से राहत तो मिल गई है। लेकिन इस पूरे मामले ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट में प्रदेश सरकार का पक्ष रखते हुए अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने तो हाई कोर्ट के निर्णय को गलत बताया ही, कानून के कई जानकारों ने भी हाई कोर्ट के फैसले पर हैरानी जाहिर की है।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जब रावत इस मामले में पक्षकार ही नहीं थे और याचिकाकर्ता की तरफ से भी ऐसी कोई याचना नहीं की गई, तब हाई कोर्ट का इतना कठोर आदेश देना आश्चर्यचकित करता है।

आदेश सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सदस्य जस्टिस एमआर शाह ने फैसला सुनाते वक्त टिप्पणी भी की कि स्वतः संज्ञान की शक्ति का प्रयोग कर दिया गया हाई कोर्ट का आदेश आश्चर्यचकित करता है। मुख्यमंत्री के वकील मुकुल रोहतगी ने तो इस फैसले को कानून का उल्लंघन बताया है। दरअसल मुख्यमंत्री इस पूरे मामले में पक्ष ही नहीं थे। मामला याचिकाकर्ता उमेश शर्मा के खिलाफ दायर एफआइआर को रद्द कराने के लिए दी गई याचिका का था। इस याचिका में भी रावत के खिलाफ किसी तरह की जांच की मांग नहीं की गई थी।

कानून के जानकार और सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकार्ड एम पी शोरावाला का मानना है कि हाई कोर्ट को इस तरह का आदेश देने से पूर्व मुख्यमंत्री का पक्ष भी सुनना चाहिए था। इससे मुख्यमंत्री को अपनी बात अदालत के सामने रखने का मौका मिलता।

दिल्ली हाईकोर्ट के वकील संजीव शर्मा का मानना है कि इस तरह के निर्णय प्रदेश को राजनीतिक अस्थिरता की तरफ ले जा सकते हैं। मुख्यमंत्री प्रदेश सरकार का मुखिया होता है और पूरे प्रदेश के विकास और गवर्नेंस की जिम्मेदारी उस पर होती है। ऐसे में बिना उसका पक्ष सुने केवल स्वतः संज्ञान लेकर उसके खिलाफ इतना बड़ा फैसला पूरे प्रदेश की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

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