उत्तराखंड में बढ़ता वन्यजीव आतंक: 25 वर्षों में 900 से अधिक मौतें, आदमखोर जानवरों के साये में जी रहे पहाड़ के गांव
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर सामाजिक और सुरक्षा संकट का रूप ले चुका है। पिछले 25 वर्षों में राज्य में वन्यजीवों के हमलों में 900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि केवल पिछले नौ वर्षों में ही 200 से ज्यादा लोग तेंदुए, बाघ और भालू जैसे आदमखोर जानवरों का शिकार बन चुके हैं। इन आंकड़ों ने हिमालयी राज्य के दूर-दराज़ गांवों में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है।
⚠️ फ्लैश: उत्तराखंड में पिछले 25 वर्षों में वन्यजीव हमलों में 900 से अधिक लोगों की मौत।
चार धाम यात्रा के दौरान राज्य में तीर्थयात्रियों और वाहनों की संख्या बढ़ने से जंगलों और वन्यजीवों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। इसका असर अब पहाड़ के गांवों में साफ दिखाई दे रहा है, जहां तेंदुए और अन्य हिंसक जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
पौड़ी, चमोली, अल्मोड़ा, रुद्रप्रयाग और अन्य पर्वतीय जिलों के ग्रामीणों का कहना है कि अब तेंदुए गांव की गलियों, स्कूलों, खेतों और बाजारों के आसपास तक दिखाई देने लगे हैं। कई क्षेत्रों में ग्रामीणों ने दावा किया है कि तेंदुओं की मौजूदगी लगभग हर सप्ताह दर्ज की जा रही है।
🚨 फ्लैश: बच्चों को स्कूल छोड़ना और महिलाओं का चारा लेने जंगल जाना बन गया है जानलेवा जोखिम।
ग्रामीण महिलाओं के लिए पशुओं के लिए घास और लकड़ी लाना पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो गया है। बच्चे स्कूल जाने से डर रहे हैं और बुजुर्ग शाम ढलने के बाद घरों से बाहर निकलने से बच रहे हैं। कई गांवों में लोगों ने रात के समय सामूहिक रूप से पहरा देना शुरू कर दिया है।
सार्वजनिक चर्चाओं और उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वन्यजीव हमलों में मारे गए लोगों में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और युवा मजदूर बड़ी संख्या में शामिल हैं। इनमें से अधिकांश लोग अपने परिवार की आजीविका के लिए जंगलों और खेतों के आसपास काम करने को मजबूर थे।
⚫ फ्लैश: पिछले नौ वर्षों में ही 200 से अधिक लोगों की जान गई, सबसे ज्यादा हमले तेंदुओं और बाघों ने किए।
हालांकि राज्य सरकार ने वन्यजीव हमलों में मौत होने पर मुआवजा राशि बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी है, लेकिन पीड़ित परिवारों का कहना है कि किसी घर के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद यह सहायता पर्याप्त नहीं होती।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें मौत के बाद मिलने वाले मुआवजे से ज्यादा जरूरत समय रहते सुरक्षा और बचाव के इंतजामों की है।
नैनीडांडा, पोखरी, थराली और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में लोगों ने हाल के सप्ताहों में सड़क जाम, प्रदर्शन और पंचायत बैठकों के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर की है। ग्रामीण लगातार पिंजरे लगाने, कैमरा ट्रैप स्थापित करने, रैपिड रिस्पॉन्स टीमों की तैनाती और 24 घंटे वन विभाग की गश्त की मांग कर रहे हैं।
📢 फ्लैश: ग्रामीणों का आरोप— “वन विभाग घटना के बाद सक्रिय होता है, पहले नहीं।”
कई ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की कार्रवाई अक्सर किसी हमले के बाद ही शुरू होती है, जबकि खतरे की आशंका पहले से मौजूद रहती है। प्रभावित क्षेत्रों में लोगों ने इसे “जंगल में आपातकाल जैसी स्थिति” बताया है।
विशेषज्ञ और स्थानीय जनप्रतिनिधि इस संकट के पीछे जंगलों के लगातार सिमटने और प्राकृतिक आवास के नुकसान को भी बड़ा कारण मानते हैं। उनका कहना है कि सड़कों का चौड़ीकरण, जलविद्युत परियोजनाएं, सुरंग निर्माण, अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और लगातार लग रही जंगल की आग ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है।
इसके अलावा जंगलों में शिकार प्रजातियों की संख्या घटने से तेंदुए और बाघ भोजन की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने लगे हैं।
🌲 फ्लैश: जंगल सिमटे, शिकार घटा और शिकारी जानवर गांवों की ओर बढ़े।
वन्यजीव हमलों का भय अब केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके कारण कई गांव खाली होने लगे हैं। पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल क्षेत्र के चौबदकोट ब्लॉक में संगलाकोटी के समीप कोलागढ़ पट्टी के एक गांव के कई परिवार अपने पुश्तैनी घर छोड़कर अन्य स्थानों पर जाने को मजबूर हो गए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग उन्हें सुरक्षा देने में असफल रहा, जिसके कारण उन्हें पलायन का कठिन निर्णय लेना पड़ा।
दूसरी ओर वन विभाग का कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पिंजरों की संख्या बढ़ाई गई है और स्ट्राइक टीमों को सक्रिय किया गया है। विभाग के अनुसार किसी जानवर को आधिकारिक रूप से आदमखोर घोषित किए जाने के बाद ही प्रशिक्षित शूटरों को तैनात किया जाता है।
पहले भी कई मामलों में अनुभवी ट्रैकर्स और शूटरों की मदद से आदमखोर जानवरों को पकड़ने या मारने की कार्रवाई की गई है।
🎯 फ्लैश: वन विभाग का दावा— संवेदनशील इलाकों में बढ़ाई गई है निगरानी और स्ट्राइक टीमों की तैनाती।
विभाग ने लोगों से सुबह और शाम के समय अकेले जंगल या सुनसान रास्तों पर न जाने, समूह में यात्रा करने और किसी भी वन्यजीव की गतिविधि की सूचना तुरंत प्रशासन को देने की अपील की है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष सरकार पर वन्यजीव सुरक्षा के मामलों में धीमी कार्रवाई का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि राजस्व वृद्धि और वन्यजीव संरक्षण दोनों क्षेत्रों में समान रूप से कार्य किया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि मुआवजा नियमों में सुधार किया गया है और प्रभावित क्षेत्रों में अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
🌧️ फ्लैश: मानसून के दौरान और बढ़ सकती है तेंदुओं की गतिविधि।
मानसून के आगमन के साथ ही ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि इस मौसम में तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियां सामान्यतः बढ़ जाती हैं। ऐसे में ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में अतिरिक्त पिंजरे, स्कूलों और गांवों के आसपास सोलर फेंसिंग, सुरक्षित चारा क्षेत्र और एक प्रभावी आपातकालीन हेल्पलाइन शामिल हैं।
लंबी अवधि के समाधान के रूप में लोग जंगलों के पुनर्वास, वन्यजीव गलियारों में परियोजनाओं पर सख्त नियंत्रण और प्राकृतिक शिकार प्रजातियों के संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
वन विभाग ने उच्च स्तरीय समीक्षा और अतिरिक्त तैनाती का आश्वासन दिया है, लेकिन जंगल के किनारे बसे हजारों परिवारों के मन में एक ही सवाल है—
“आखिर वे कब तक डर के साये में जीते रहेंगे?”
जब तक कोई ठोस और व्यापक रणनीति जमीन पर लागू नहीं होती, तब तक उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में वन्यजीव आतंक का यह संकट लगातार गहराता ही जाएगा।
