*3 किलोमीटर सड़क व 55 फुट लम्बे 19 फीट ऊंचे व दस फीट चौड़े पुल को मात्र 55 दिन मे बनाकर क्षेत्र की जनता को समर्पित किया, इस दशरथ मांझी ने।*

 

यमकेश्वर-:लोक डाउन में लगातार 42 दिनों तक इन युवाओं ने कड़ी मेहनत से अपने गाँव तक सड़क का किया था निर्माण। इस सड़क के लिए वर्षो से इलाके के लोग प्रयासरत रहे समय समय पर यूपी के राजधानी लखनऊ तक लोगो ने अपनी फरियाद की लेकिन कुछ नही हुआ। उसके बाद हमारे जन संघर्षों के बदौलत उत्तराँचल का उदय हुआ। सोचा था अब लखनऊ नही जाना पड़ेगा। क्योकि उत्तरांचल की राजधानी यमकेश्वर विधानसभा से सबसे नजदीक मानी जाती है। ओर इसी विधानसभा का विकास नही हो पाया। लेकिन सबसे पहले तो उत्तर का आँचल को ही काट दिया गया, उत्तर के आँचल को खण्ड खण्ड करके उत्तराखंड का नया नामकरण कर दिया गया। इस रोड की जद्दोजहद में लगे लोगो की हिम्मत भी जबाब देने लग गई थी। और सरकार से भरोसा टूट चुके इन लोगो के बीच आये, यमकेश्वर के एक उर्जावान व्यक्ति, जोकि हमारी भारतीय सेना में प्रशिद्ध पर्वतारोही रहे और कई साहसिक एडवेंचर कर चुके कई मैडल हासिल कर चुके, पूर्व फौजी श्री सुदेश भट्ट, छेत्र पंचायत सदस्य बुंगा यमकेस्वर ने अपनी सूझबूझ से इन सभी लोगो को अपनी योजना बताई और फिर सुरु हुआ मुख्यमार्ग से गाँव तक दोपहिया वाहन पहुंचाने के लिए रास्ते का निर्माण। जिसके लिए प्रथम लॉक डाउन में 42 दिन के कड़े परिश्रम से सभी बच्चे, बूढ़े, जवान , मिलकर यह दुपहिया रोड गॉव तक पहुंचाई, लेकिन एक समस्या और थी जिसे पूरा करना सरकार के अलावा किसी के बस की बात नही थी। जोकि एक बरसाती नाले के ऊपर पुल निर्माण करना था। लेकिन उस जनून में सुदेश भट्ट ने फिर एक मुहिम उक्त पुल के लिये चलाई ओर उसमें कई सामाजिक लोगों के आर्थिक मदद से उस पुलिया के निर्माण कर सरकार को आइना दिखाया। फिर भी सरकार ने एक बार भी इस साहसिक इंसान को सम्मानित नही किया, जबकि सरकार ने अनगिनत ऐसे कार्य मे लगे लोगों को सम्मानित किया। ओर जब सुदेश भट्ट जी से इस विषय मे पूछा गया तो उनका जबाब था। की में इस ओर ज्यादा ध्यान नही देता। मुझे मेरे देश की सेना ने बहुत सम्मानित किया है। वही मेरे लिए बहुत है। मेरे क्षेत्र की जनता ने सम्मान दिया में उनका आभारी हूं। रही सरकार की बात वे मुझे न सम्मानित कर सिर्फ इस रोड को पास कर गॉव तक अच्छी रोड बनवा दे। वही हमारे लिए सम्मान की बात होगी।

लोक डाउन के दौरान अपने युवा भाईयों के साथ श्रमदान से बनाई गयी सडक पर आज फिर बाईक से सफर करते हुये, उन दिनों जब लोग घरों मे कैद थे शायद मुझे व मेरी पुरी टीम को दिब्य शक्तियों का आशीर्वाद ही प्राप्त था जो निरंतर 42 दिनों तक श्रम दान करते हुये अपने फावडे घन सबल हथौडियों को लेकर इन दुर्गम कंद्राओं मे गांव तक सडक पहुंचाने के लिये संघर्ष करते रहे हमारे ग्रामींण ही नही बल्कि प्रवासी व आप जैसे कलमकार बंधु हमारी हौसलाफजाई करते हुये हमें इस असंम्भव कार्य मे संजीवनी प्रदान करते रहे, आप जैसे शुभ चिंतकों की हौसलाफजाई ही तो थी जो हम 42 दिन मे सडक बनाने के बाद थके नही बल्कि जिस पुल की मांग हम दशकों से कर रहे थे उसे बनाने के लिये हमने एक बार फिर अपनी युवा टीम से आहवान किया सब एक बार फिर एकजुट हुये व अपने परम मित्रों पूज्य जनों प्रवासी बंधुओं व मेरे कई सैन्य साथियों व अधिकारियों द्वारा इस मुश्किल कार्य मे एक बार फिर हमारी हौसलाफजाई कर सहयोग देते हुये हमे ऊर्जा प्रदान की गयी व आप जैसे कलमकार हर रोज अपने अपने स्तर से मुझे व मेरी टीम मे जोश भरते गये ये आप लोगों का प्रोत्साहन ही था जिस पुल को सरकार एक दशक से भी अधिक समय से बनाने मे नाकाम साबित हुयी हमारी टीम ने इस 55 फुट लम्बे 19 फीट ऊंचे व दस फीट चौड़े पुल को मात्र 55 दिन मे बनाकर क्षेत्र की जनता को समर्पित किया, पुल की बर्तमान तस्वीर सहित कुछ पहले की तस्वीर भी आप अवश्य देखें।

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