देहरादून

उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का शेर दिवाकर भट्ट नहीं रहे, आंदोलनकारी मंच ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

 

25 नवम्बर, देहरादून।
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी मंच ने आज राज्य आंदोलन के पुरोधा, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी और उत्तराखण्ड सरकार में पूर्व राजस्व मंत्री दिवाकर भट्ट जी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। देर सायं उनके निधन की पुष्टि होते ही राज्य आंदोलनकारियों में शोक की लहर दौड़ गई।

प्रदेश प्रवक्ता प्रदीप कुकरेती ने भावुक स्वर में बताया कि “सिर्फ चार दिन पहले ही मैं वार्ड में उनसे मिला था। उनके स्वास्थ्य को देखकर तनिक भी आभास नहीं था कि फील्ड मार्शल हमें यूँ अचानक छोड़कर चले जाएंगे। वे बेचैन जरूर थे, लेकिन लगातार मुझसे राज्य का विजन पूछते रहे। मैंने उन्हें कहा कि आप उत्तराखण्ड के शेर हैं, पर वे असहाय भाव से बोले—अब कौन सा शेर… कुछ नहीं बचा।”
प्रवक्ता ने कहा कि 09 अगस्त 2023 को ‘क्रांति दिवस’ पर मूल–निवास सशक्त भू-कानून की माँग को लेकर जब मंच ने मुख्यमंत्री आवास कूच किया था, तब दिवाकर भट्ट दून आकर विशेष रूप से उस रैली में शामिल हुए। “वह उनके जीवन का अंतिम कूच था, जो आज याद बनकर रह गया है।”

उन्होंने स्मरण किया कि वर्ष 2017 में दिवाकर भट्ट ने स्वयं कहा था—“कुकरेती, अब तुम आगे आओ और संभालो, हम बूढ़े हो चले।” उस दौरान अनेक युवा साथ जुड़े, जो बाद में विभिन्न दलों के साथ चले गए।

प्रदेश अध्यक्ष जगमोहन सिंह नेगी और महासचिव रामलाल खंडूड़ी ने कहा कि “राज्य आंदोलन का एक अथक योद्धा हमारे बीच से चला गया। उनके संघर्ष और त्याग की भरपाई कभी नहीं हो सकती।”
उन्होंने बताया कि कई बार गंभीर रूप से बीमार पड़ने व एक बार घायल होने पर उन्हें हेलीकॉप्टर से दून लाया गया था। “हम जब भी उनका हालचाल लेने जाते, वे प्रदेश की गतिविधियों और राज्य के भविष्य पर ही चर्चा करते थे।”

महिला आंदोलनकारी पुष्पलता सिलमाणा, शकुन्तला रावत, सरिता गौड़ सहित अन्य ने कहा कि उनके साथ संघर्ष के अनेक प्रसंग अविस्मरणीय हैं—कभी हरिद्वार, कभी श्रीनगर, कभी खेंट पर्वत और श्रीयंत्र टापू पर भू–हड़ताल, तो कभी जेल यात्राएँ… संघर्षों की यह फेहरिस्त बहुत लंबी है।

वरिष्ठ आंदोलनकारी गणेश डंगवाल, धर्मपाल रावत और केशव उनियाल ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि “दिवाकर भट्ट जिस मुकाम के हकदार थे, जनता ने उन्हें वह समर्थन नहीं दिया। नई पीढ़ी भी उनके पारिवारिक बलिदान और व्यक्तिगत संघर्ष को भुला बैठी। परिणामस्वरूप आज उक्रांद पहचान के संकट से गुजर रहा है। अब समय आ गया है कि लोग उनके संघर्ष को याद करें, राज्य आंदोलनकारियों के सपनों को पूरा करने के लिए पुनः कमर कसें और क्षेत्रीय दलों को मजबूत बनाएं।”

श्रद्धांजलि देने वालों में शामिल रहे:
केशव उनियाल, वेदा कोठारी, जगमोहन सिंह नेगी, प्रदीप कुकरेती, शिवानंद चमोली, सुरेश नेगी, धर्मपाल रावत, गणेश डंगवाल, बलबीर नेगी, हरी सिंह, मनोज नौटियाल, प्रभात डण्डरियाल, विनोद असवाल, सुमित थापा, मोहन खत्री, चन्द्रकिरण राणा, राकेश नौटियाल, राजेश पान्थरी, विरेंद्र गुसाईं, कलम सिंह गुसाईं, रघुबीर तोमर, हरजिंदर सिंह, पुष्कर बहुगुणा, नरेन्द्र विजय बलूनी, आशीष उनियाल, मोहम्मद थापा, जयेन्द्र सेमवाल, पुष्पलता सिलमाणा, तारा पांडे, रामेश्वरी नेगी, राजेश्वरी रावत, अरुणा थपलियाल, गुरदीप कौर, सरिता गौड़, राधा तिवारी, शकुन्तला रावत, सुलोचना भट्ट, यशोदा नेगी, सुभागा फर्स्वाण, राजेश्वरी परमार, द्वारिका बिष्ट, सुशीला अमोली आदि।

Uma Shankar Kukreti