वर्जनाएं तोड़ती महिलाएं या अस्तित्व की जंग,निशा समेत दर्जनों युवतियां कर रही हैं रोडवेज में कंडक्टरी

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– निशा समेत दर्जनों युवतियां कर रही हैं रोडवेज में कंडक्टरी
– जो परिस्थिति के अनुसार ढल जाए, वही जीवित रहेगा: डार्विन

देहरादून–  सुबह के लगभग आठ बजे। देहरादून से हरिद्वार के बीच चलने वाली जेएनयूआरएम की बस। इस बस की कंडक्टर है 25 वर्षीय दुबली-पतली निशा। बाएं हाथ में सीटी पकड़े और दाएं हाथ में टिकट रोलर। बस चलती है, निशा बस के लहराने के साथ लहराती है लेकिन संभलती हुई यात्रियों को टिकट देती है। पैसे गिनती और आटोमीटर में फीड कर टिकट यात्रियों को देती। बीच-बीच में वह यात्रियों को आने वाले बस स्टाप के बारे में भी बताती। निशा से मैंने पूछा, कंडक्टर क्यों बनी? टका सा जवाब मिला, बेरोजगारी जो इतनी है। परिजनों ने इस नौकरी के लिए हां कर दी। कोई चारा ही नहीं था। पिता प्राइवेट नौकरी करते हैं और भाई पढ़ रहा है। भानियावाला निवासी निशा कहती है कि जब कहीं ढंग का रोजगार नहीं मिला तो कंडक्टरी की वैकेंसी आई। उसने एग्जाम दिया और फिर इंटरव्यू। कांट्रेक्ट की नौकरी है लेकिन वेतन ठीक है। वह कहती है 450 वैकेंसी थी, इसमें से आधी लड़कियां हैं। मैंने पूछा, माता-पिता खुश हैं, वो हंसकर सिर हिला देती है। उसकी ड्यूटी सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक है। दून-हरिद्वार के बीच रोज तीन फेरे लगते हैं। कहती है कि रात को रोडवेज की बस से वह भानियावाला घर चली जाती है। वह खुश है। वेतन का क्या करती है? कहती है कि अधिकांश पैसे घर पर दे देती हूं लेकिन अपने लिए भी बचाती हूं। 
दरअसल निशा आज के दौर का प्रतिनिधित्व कर रही है। आपको आटो-टैक्सी चलाती महिलाएं नजर आ जाएंगी। देहरादून में महिला रिक्शाचालक भी है। यह रोजगार पाने और वर्चस्व की जंग है। इस जंग में बेटियां -बेटों के साथ टक्कर ले रही हैं। वर्जनाएं तोड़ रही हैं। समाज में चाल्र्स डार्विन का सिद्धांत लागू हो रहा है कि जो परिस्थिति के अनुसार ढल जाए, वही जीवित रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला जी की एफबी वाल से साभार 

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