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लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता:डॉ. रेनू डी. सिंह

 

ICDS के 50 वर्ष, 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अब एक व्यापक कानून की जरूरत

By Dr. Renu D. Singh

भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था ने लगभग पाँच दशकों से देश के बच्चों, माताओं और वंचित परिवारों तक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1975 में शुरू हुई एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) का उद्देश्य बच्चों को जीवन की बेहतर शुरुआत देना तथा माताओं और परिवारों को पोषण, स्वास्थ्य और विकास संबंधी सहायता उपलब्ध कराना था।

पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे महत्वपूर्ण जमीनी चेहरों में शामिल हैं।

लेकिन इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास आज भी मौजूद है।

राज्य इन महिलाओं से महत्वपूर्ण और निरंतर सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन उनके अधिकारों, सेवा-शर्तों, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला कोई व्यापक केंद्रीय वैधानिक ढाँचा अब तक नहीं बना है।

यही वह विरोधाभास है जिसे अब दूर करने की आवश्यकता है।

भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

भारत की कल्याण व्यवस्था के पीछे खड़ा अदृश्य कार्यबल

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पोषण सामग्री वितरित करने या रजिस्टर भरने तक सीमित नहीं हैं। समय के साथ उनकी जिम्मेदारियों का दायरा लगातार बढ़ा है।

वे प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा, बच्चों के पोषण और वृद्धि की निगरानी, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण संबंधी जागरूकता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता, गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं की सहायता, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, आँकड़ों के संकलन और रिपोर्टिंग जैसे अनेक कार्यों में योगदान देती हैं।

कई परिस्थितियों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी गरीब या वंचित परिवार के लिए राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं।

वे अपने समुदायों को करीब से जानती हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सा बच्चा कुपोषण या विकास संबंधी समस्या से जूझ रहा है, किस परिवार को सहायता की आवश्यकता है और किन महिलाओं को अतिरिक्त सहयोग चाहिए।

फिर भी विडंबना यह है कि राज्य की योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुँचाने वाली यही महिलाएँ स्वयं पर्याप्त कानूनी सुरक्षा से वंचित हैं।

यह केवल रोजगार नीति का प्रश्न नहीं है।

यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है।

पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं हो सकता

ICDS की यात्रा आधी सदी पार कर चुकी है। इस दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों ने अपने समुदायों की सेवा की।

लेकिन लंबी सेवा और बढ़ती जिम्मेदारियों के बावजूद उनके लिए ऐसी व्यापक वैधानिक व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी, जो उनके योगदान के अनुरूप अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करे।

मूल प्रश्न सरल है—

यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित रखे, जो उन जिम्मेदारियों के अनुरूप होनी चाहिए?

उन्हें “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कह देना इस मूल प्रश्न का पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता, खासकर तब जब वास्तविक कार्यभार वर्षों में लगातार बढ़ा है।

रिपोर्टिंग बढ़ी है। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कार्य बढ़े हैं। प्रारंभिक बाल विकास की जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।

इसलिए कानून और संस्थागत व्यवस्था को भी समय के साथ बदलना होगा।

लैंगिक प्रश्न को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता

आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। ऐसे में उनके श्रम को पर्याप्त वैधानिक मान्यता न मिलना अपने आप में एक गंभीर लैंगिक प्रश्न खड़ा करता है।

समाज जब महिलाओं के श्रम को अपनी कल्याण व्यवस्था के लिए आवश्यक मानता है, लेकिन उसी श्रम के अधिकारों और मूल्य को कमतर आँकता है, तो यह एक पुरानी सामाजिक संरचना को दोहराता है।

महिलाओं का काम तब “आवश्यक” माना जाता है जब समाज को उसकी जरूरत होती है, लेकिन जब वही महिलाएँ सम्मानजनक पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों की मांग करती हैं, तो उनके काम के मूल्य पर सवाल उठने लगते हैं।

इसलिए आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन अथवा सरकारी खर्च के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।

इसे लैंगिक-संवेदनशील शासन के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।

एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य महिला सशक्तीकरण की बात करते हुए उन लाखों महिलाओं को व्यापक वैधानिक सुरक्षा से वंचित नहीं रख सकता, जो उसके सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को घर-घर तक पहुँचाती हैं।

“मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर

आंगनवाड़ी व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास अपने आप में यह बताता है कि अब उसके मानव संसाधन ढाँचे की समीक्षा आवश्यक है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ लगातार बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं, प्रशासनिक और डिजिटल कार्य बढ़े हैं तथा स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक बाल विकास से जुड़ी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हुई है।

इसलिए केवल मानदेय में समय-समय पर वृद्धि करना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता।

आवश्यकता ऐसी अधिकार-आधारित व्यवस्था की है, जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की स्थिति, सेवा की न्यूनतम शर्तें और सामाजिक सुरक्षा कानून के माध्यम से स्पष्ट हों।

नीतियाँ और सरकारी आदेश बदलते रहते हैं। लेकिन बुनियादी अधिकारों को केवल प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 में क्या होना चाहिए?

एक व्यापक केंद्रीय कानून राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, जबकि राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता दी जा सकती है।

ऐसे कानून में कम से कम निम्नलिखित विषयों पर विचार होना चाहिए—

1. वैधानिक मान्यता

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण व्यवस्था में स्पष्ट वैधानिक दर्जा दिया जाए।

2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक

पारिश्रमिक वास्तविक जिम्मेदारियों और कार्यभार के अनुरूप हो तथा उसे समय-समय पर संशोधित करने की पारदर्शी व्यवस्था हो।

3. सामाजिक सुरक्षा

पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, दुर्घटना मुआवजा, दिव्यांगता सुरक्षा, जीवन बीमा और अन्य आवश्यक सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिए प्रभावी व्यवस्था हो।

4. कार्य की गरिमा

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को केवल किसी अस्थायी सरकारी योजना की कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की महत्वपूर्ण कार्यकर्ता के रूप में मान्यता मिले।

5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ

कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, आवश्यक उपकरण, आधारभूत सुविधाएँ और व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक तय किए जाएँ।

6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा

यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, धमकी, भेदभाव और मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई के विरुद्ध प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था हो।

7. उचित कार्यभार

यदि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं तो उनके अनुरूप प्रशिक्षण, संसाधन और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाए।

लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाना, लेकिन संसाधन और सुरक्षा न बढ़ाना, संरचनात्मक शोषण की स्थिति पैदा कर सकता है।

8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास

प्रशिक्षण, प्रमाणन, कौशल विकास, पदोन्नति अथवा करियर प्रगति के अवसरों की स्पष्ट व्यवस्था हो।

9. तकनीक का इस्तेमाल बोझ घटाने के लिए हो

डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक काम को सरल बनाना होना चाहिए, न कि कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त डेटा-एंट्री और रिपोर्टिंग का बोझ डालना।

तकनीकी उपकरण, कनेक्टिविटी, प्रशिक्षण और सहायता भी व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए।

10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधियों को उनकी कार्य परिस्थितियों और नीतियों से संबंधित चर्चाओं में अपनी बात रखने का संस्थागत अवसर मिलना चाहिए।

जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उनकी आवाज नीति-निर्माण में भी सुनी जानी चाहिए।

प्रारंभिक बाल विकास ही राष्ट्र निर्माण है

आंगनवाड़ी व्यवस्था को केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम मानना उसके वास्तविक महत्व को कम करके देखना होगा।

यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है।

बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, पोषण, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, स्वास्थ्य जागरूकता, प्रारंभिक शिक्षा और सामाजिक विकास में योगदान देती हैं, वे केवल आज की समस्या का समाधान नहीं कर रही होतीं।

वे भारत के भविष्य के नागरिक और कार्यबल की नींव मजबूत कर रही होती हैं।

यदि भारत स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा।

संवैधानिक प्रश्न: क्या लैंगिक न्याय बिना अधिकारों के संभव है?

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की मांग केवल प्रशासनिक सुधार की मांग नहीं है। इसके पीछे संवैधानिक दृष्टि भी मौजूद है।

भारतीय संविधान समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39, 42 और 47 आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषयों के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं।

ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या मुख्यतः महिला कार्यबल से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ लेकर उन्हें पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा से वंचित रखना समानता और गरिमा की संवैधानिक भावना के अनुरूप है?

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए—

“क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च उठा सकता है?”

बल्कि बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए—

“क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन महिलाओं को अधिकार न देने की सामाजिक और मानवीय कीमत उठा सकता है, जो दशकों से उसकी कल्याण व्यवस्था को जमीनी स्तर पर चला रही हैं?”

राष्ट्रीय न्यूनतम मानक और सहकारी संघवाद

आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्यों की साझा सरकारी संरचना से जुड़ी हैं। इसलिए प्रस्तावित कानून को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारों और सुरक्षा का न्यूनतम मानक निर्धारित करना चाहिए।

इसके साथ राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

इससे सहकारी संघवाद की भावना भी मजबूत होगी और देश के अलग-अलग राज्यों में समान जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं के बीच अत्यधिक असमानताओं को कम करने की दिशा में मदद मिलेगी।

राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की आवश्यकता

प्रस्तावित कानून के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है।

यह आयोग—

  • वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी;
  • पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा;
  • संरचनात्मक शिकायतों की जांच;
  • वार्षिक रिपोर्ट का प्रकाशन;
  • सरकारों को नीति संबंधी सुझाव;
  • लैंगिक असमानताओं का अध्ययन;
  • प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश; तथा
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माण तक पहुँचाने

जैसे कार्य कर सकता है।

इससे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल सरकारी आदेशों की निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न रहकर सामाजिक विकास व्यवस्था की मान्यता प्राप्त हितधारक बन सकेंगी।

लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अब केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

वे भारत के विकास की वास्तविक हितधारक हैं।

वे उन समुदायों को समझती हैं जहाँ सरकारी संस्थानों की पहुँच सीमित हो सकती है। वे बच्चों, माताओं और परिवारों के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं। वे कई सामाजिक और पोषण संबंधी समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले पहचान लेती हैं।

उनका अनुभव और स्थानीय ज्ञान स्वयं एक राष्ट्रीय संसाधन है।

इसलिए उन्हें केवल योजनाओं को लागू करने वाली कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति के निर्माण और सुधार में योगदान देने वाली पेशेवर साझेदार के रूप में देखना चाहिए।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — पाँच सिद्धांतों की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता

प्रस्तावित कानून की आधारशिला पाँच मूल सिद्धांतों पर होनी चाहिए—

मान्यता।
गरिमा।
सुरक्षा।
समानता।
भागीदारी।

हर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ और राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ देने की स्वतंत्रता मिले।

कानून में इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को स्वीकार किया जाए। सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा को प्रभावी बनाया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश को स्पष्ट संदेश देना चाहिए—

“जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।”

भारत की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता की एक कसौटी

भारत एक मजबूत, विकसित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है।

लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।

एक मजबूत राष्ट्र वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं।

एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता—वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले प्रभावी अधिकार देता है।

और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता—वह उन कार्यकर्ताओं की भी सुरक्षा करता है, जो उन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं।

ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि भारत अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़े।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार देश में लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। इन लाखों महिलाओं के योगदान को केवल मानदेय की व्यवस्था तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्हें उनके कार्य के अनुरूप सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा और वैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।

लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता केवल भाषणों और नीतियों में नहीं, बल्कि लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में दिखाई देनी चाहिए।

अब समय है—आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 का।

कार्यकर्ता के लिए।
बच्चे के लिए।
महिला के लिए।
संविधान के लिए।
भारत के भविष्य के लिए।

लेखिका —
डॉ. रेनू डी. सिंह
पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट