भाषा बच्यायो अभियान से मातृभाषाओं को नई पहचान देने की पहल, धाद ने सरकार को सौंपा मांगपत्र
देहरादून, 21 फरवरी। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर उत्तराखंड की लोकभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध संस्था धाद मातृभाषा एकांश ने “भाषा बच्यायो यानी भाषा बोलो” अभियान की शुरुआत की। इस अवसर पर धाद ने सार्वजनिक आयोजन, भाषा संवाद कार्यक्रम और शिक्षण पहल के साथ ही भाषा मंत्री एवं भाषा संस्थान की निदेशक मायावती ढकरियाल को मांगपत्र भी सौंपा।
धाद के सचिव तन्मय ममगाईं ने बताया कि संस्था की स्थापना चार दशक पूर्व लोकभाषाओं की चेतना को मजबूत करने के उद्देश्य से हुई थी। धाद ने लोकभाषा सम्मेलनों, साहित्य प्रकाशन और जनसंवाद के माध्यम से लगातार भाषाई जागरूकता का कार्य किया है। वर्ष 2010 से अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर धाद द्वारा शुरू की गई पहल आज एक व्यापक आंदोलन का रूप ले चुकी है, जिसका उद्देश्य स्थानीय भाषाओं को प्रवाहमान और समृद्ध बनाए रखना है।
मातृभाषा एकांश की प्रभारी माधुरी रावत ने बताया कि इस वर्ष तीन दिवसीय सार्वजनिक आयोजन के अंतर्गत ऑनलाइन विमर्श, कोटद्वार में कवि सम्मेलन, नाटक और सम्मान समारोह आयोजित किए गए। इसके साथ ही धाद स्मृति वन में गढ़वाली मुहावरों के आदान-प्रदान, भाषा सीखने और पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों के माध्यम से भाषा और संस्कृति को जोड़ने का प्रयास किया गया। उन्होंने बताया कि संस्कृति कर्मी शांति बिंजोला के संयोजन में “भाषा बच्यायो” अभियान के तहत भाषा संवाद और शिक्षण कार्यक्रम आगामी मार्च से प्रारंभ होगा, जिसके माध्यम से लोगों को अपनी मातृभाषा सीखने और सिखाने का अवसर मिलेगा।
धाद के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हर्षमणि व्यास ने कहा कि सामाजिक और सरकारी स्तर पर मातृभाषाओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिलने के कारण नई पीढ़ी में अपनी भाषा से दूरी बढ़ती जा रही है, जो सांस्कृतिक पहचान के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए अब संवाद, शिक्षण और संस्थागत प्रयासों को प्राथमिकता देनी होगी।
इस अवसर पर धाद द्वारा शासन को सौंपे गए मांगपत्र में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल किए गए। संस्था ने भाषा संवाद फेलोशिप की घोषणा कर युवाओं को मातृभाषा सिखाने के लिए प्रोत्साहित करने, प्रदेश में भाषा स्कूलों की स्थापना, प्रतिवर्ष लोकभाषा सप्ताह मनाने, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा लोक सेवा परीक्षाओं में स्थानीय साहित्य, इतिहास और संस्कृति से जुड़े विषयों को शामिल करने की मांग की। इसके साथ ही गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की भी मांग की गई।
इस अभियान के माध्यम से धाद ने स्पष्ट संदेश दिया है कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और पहचान की आधारशिला है, जिसे संरक्षित और आगे बढ़ाना समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
