उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन : कारण, प्रभाव और समाधान (विशेष लेख :उमाशंकर कुकरेती)
Migration from the mountains of Uttarakhand: causes, effects and solutions (Special article: Umashankar Kukreti)

उत्तराखंड के निर्माण के दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन जिस सपने के साथ यह पर्वतीय राज्य बना था, वह सपना आज भी अधूरा दिखाई देता है। पहाड़ों का विकास, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण और स्थानीय लोगों को रोकने का वादा आज भी उन चुनौतियों के बीच दबा है जिसमें सबसे बड़ी चुनौती है—“पलायन”। पहाड़ों से खाली होते गांव और शहरों की ओर जाती युवाशक्ति न सिर्फ सामाजिक ढांचे को तोड़ रही है बल्कि उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति और भूगोल पर भी गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रही है।
पलायन : स्थिति और सच्चाई
उत्तराखंड के लगभग दो हजार से अधिक गांवों को आज ‘निर्जन’ घोषित किया जा चुका है। इनमें कई गांव ऐसे हैं जहां ताला बंद घर पहाड़ के उजड़ने की कहानी खुद बयां करते हैं। पहाड़ों में स्कूल तो हैं, लेकिन छात्र नहीं; अस्पताल तो हैं, लेकिन डॉक्टर नहीं; और खेत तो हैं, लेकिन काम करने वाला कोई नहीं। धीरे-धीरे पहाड़ों का मूल चरित्र बदल रहा है और ये स्थिति किसी एक क्षेत्र की नहीं बल्कि पूरे कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र की सामूहिक चुनौती है।
ग्रामीण युवा बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सुविधाओं की तलाश में देहरादून, दिल्ली, हरिद्वार या देश-दुनिया के बड़े शहरों में जा रहे हैं। यह मानना गलत होगा कि पलायन सिर्फ रोजगार के लिए हो रहा है—असल समस्या है सुविधाओं का असंतुलन।
पलायन के प्रमुख कारण
रोजगार के अवसर सीमित
उत्तराखंड में उद्योगों की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। पहाड़ों में रोजगार के साधन न के बराबर हैं। खेती घाटे का सौदा बन चुकी है, पशुपालन और स्थानीय व्यवसाय पर जंगली जानवरों और संसाधनों की कमी की चोट है। जिस युवा के सामने रोज़गार ही नहीं, वह गांव छोड़ कर शहर जाएगा ही।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
गांवों में अस्पताल तो हैं पर डॉक्टरों की कमी स्थायी समस्या है। गंभीर बीमारी होने पर मरीज को देहरादून, ऋषिकेश या दिल्ली तक भेजना पड़ता है। जब जीवन का आधार ही सुरक्षित न हो, तो लोग स्वाभाविक रूप से शहर की ओर पलायन करेंगे।
शिक्षा व्यवस्था कमजोर
पहाड़ के अधिकांश सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की कमी है। पैरेंट्स अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए उन्हें शहर भेजना मजबूरी समझते हैं। बच्चा पढ़ने गया और परिवार उसका पीछा करते हुए गांव खाली हो गया—यही व्यवहारिक स्थिति है।
जंगली जानवर और खेती का संकट
पहाड़ों में खेती का सबसे बड़ा संकट जंगली जानवर हैं। जंगली सूअर, भालू, बंदर और अन्य जानवर फसल को देखते ही बर्बाद कर देते हैं। किसान मेहनत करे, खेत खाली हों—ऐसे में कृषि छोड़ कर पलायन ही विकल्प बचता है।
भौगोलिक चुनौतियाँ और आधारभूत सुविधाओं की कमी
कई ऐसे गांव हैं जहां सड़क, इंटरनेट, फोन नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएँ आज भी नहीं हैं। आज के डिजिटल दौर में जहां बाकी देश तकनीक से आगे बढ़ रहा है, कई पहाड़ी गांव तकनीकी पिछड़ेपन के कारण ही पिछड़ रहे हैं।
पलायन के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
ग्रामीण समाज की असली पहचान आपसी रिश्तों, परंपराओं और संस्कृति से बनती है। लेकिन पहाड़ों में अब त्योहार, मेले और परंपराएँ कमजोर होती जा रही हैं, क्योंकि आबादी घट रही है।
बुजुर्ग माता-पिता गांव में अकेले रह जाते हैं और बेटा-बहू शहर। गांव में सामूहिक रिश्ते खत्म हो जाते हैं। कई गांव आज भी सिर्फ बुजुर्गों और महिलाओं के भरोसे चल रहे हैं।
स्थानीय भाषाएँ, लोकगीत, परंपराएँ और यहां तक कि खानपान की संस्कृति भी धीरे-धीरे टूट रही है। पहाड़ी संस्कृति सिर्फ किताबों और यूट्यूब तक सीमित होती जा रही है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा
उत्तराखंड एक सीमांत राज्य है और चीन सीमा से सटा है। सीमावर्ती गांवों में आबादी कम होना भारत की सुरक्षा दृष्टि से भी चिंता का विषय है। रणनीतिक दृष्टि से सीमा क्षेत्रों में जनसंख्या का रहना आवश्यक है। लेकिन सीमावर्ती जिलों से तेजी से पलायन हो रहा है। यह देश की सुरक्षा नीति के लिए भी चुनौती है।
सरकारी पहलें और उनकी सीमाएँ
राज्य सरकारों ने समय-समय पर कदम जरूर उठाए हैं—जैसे पलायन आयोग, होमस्टे नीति, जैविक खेती प्रोत्साहन, पर्यटन विकास योजनाएँ, CM रोजगार योजनाएँ आदि।
लेकिन इन योजनाओं का लाभ गांवों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पा रहा। ज़्यादातर योजनाएँ दस्तावेज़ों और घोषणाओं तक सीमित रह गई हैं। नीति में इच्छाशक्ति की कमी और ग्रामीण स्तर पर निगरानी का अभाव सबसे बड़ी समस्या है।
समाधान—व्यावहारिक और व्यवहारिक दृष्टि
पहाड़ आधारित रोजगार मॉडल
पहाड़ की प्राकृतिक क्षमता को रोजगार में बदलना होगा —
- कृषि आधारित उद्योग
- औषधीय जड़ी-बूटी
- वन उत्पाद
- मधुमक्खी पालन
- फल प्रसंस्करण
- दूध व दुग्ध उत्पाद
स्थानीय कच्चे माल पर आधारित उद्योग ही गांव में रोजगार ला सकते हैं।
पर्यटन का वैज्ञानिक विकास
होमस्टे, स्थानीय भोजन, संस्कृति आधारित टूरिज्म, ट्रैकिंग, एडवेंचर, टेक्नो-क्लाइमेटिक पर्यटन जैसे मॉडल पहाड़ के युवाओं को बड़े रोजगार दे सकते हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य की बराबरी
यदि गांवों में क्वालिटी स्कूल और मजबूत हेल्थ सिस्टम उपलब्ध किया जाए, तो परिवार शहर नहीं जाएंगे। इसलिए पहाड़ों में डिजिटल स्कूल, टेली-मेडिसिन और मोबाइल हेल्थ सर्विस अनिवार्य रूप से लागू करनी होगी।
सीमांत जिलों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज
सीमा के गांवों के लिए विशेष टैक्स रियायत, सब्सिडी और रोजगार पैकेज जरूरी है। ये राष्ट्रीय हित में भी जरूरी है।
डिजिटल कनेक्टिविटी
100% इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क, डिजिटल सेंटर्स—अगर पहाड़ डिजिटल होगा तो रोजगार बढ़ेगा।
क्या पहाड़ वापस बस सकते हैं?
हां। पर्यटन, जैविक कृषि, डिजिटल बिजनेस, BPO, वर्क-फ्रॉम-होम मॉडल, और उद्योग आधारित नीति पहाड़ की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है।
युवा आज शहर इसलिए जाते हैं क्योंकि गांव में विकल्प नहीं। यदि विकल्प उपलब्ध हों, तो लौटकर आना भी संभव है।
निष्कर्ष
पलायन सिर्फ रोजगार की बात नहीं—यह विकास की असमानता, सामाजिक व्यवस्था के टूटने और राज्य की पहचान पर गंभीर चोट है।
यदि उत्तराखंड को बचाना है तो नीति भावनाओं की नहीं, अर्थव्यवस्था और व्यवहार की होनी चाहिए। पहाड़ को केवल पर्यटन राज्य नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की प्रयोगशाला बनाना होगा।
आज उत्तराखंड को एक “रिवर्स माइग्रेशन मॉडल” की आवश्यकता है—जहां लोग लौटकर आएं, गांव फिर बसें, और पहाड़ फिर जीवित हों।
यह सवाल सरकार से अधिक समाज का भी है। पहाड़ हमारी विरासत हैं—यदि उन्हें हम नहीं बचाएँगे, तो कौन बचाएगा?
