पीएम मोदी के मंत्र को साकार करता रिटायर्ड फौजी,लोगों को कर रहा प्रेरित

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यमकेश्वर(कपिल रतूड़ी)- कोरोना की विश्वव्यापी विमारी से एक ओर जँहा दुनिया त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है वंही दूसरी तरफ यमकेश्वर का एक शख़्स लोकडोंन को दरकिनार कर अपने किये पर बांछे खिला रहा है। लोकडोंन की विषम परिस्थितियों से देश ही नही दुनिया की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा चुकी है वही पौड़ी जिले के यमकेश्वर विकास खण्ड के कस्याळी गांव के सुबोध सिंह नेगी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भरता के संदेश को साकार कर रहा है।

भारतीय सेना से सन 2010 में सेवानिवृत्ति के पश्चात सुबोध नेगी ने गांव के एक छोर पर मामूली सी रकम खर्च कर शौकिया तौर पर सन 2012 में 30 पेड़ पॉपुलर के लगाए थे जिनकी कीमत आज लाखो रुपए में है।

इसके अतिरिक्त सुबोध नेगी प्रति वर्ष 100 पेड़ अपनी क्षमता के अनुरूप गांवो में भी रोपित करते है। समाजसेवा को लालायित सुबोध नेगी की पिछले आठ दस वर्षों की मेहनत की फसल अब कटने को तैयार है जिसकी कीमत उन्हें अब लाखो रुपये में प्राप्त होगी।

गावो में हैं स्वरोजगार की अपार संभावनाएं-सुबोध नेगी 

सुबोध नेगी कहते है कि गांव में स्वरोजगार की पर्याप्त सम्भवना है परन्तु जानकारी के अभाव में हजारों बेरोजगार लड़के फैक्ट्रियों की खाक छानने को मजबूर है यदि बेरोजगार युवक इस प्रकार अपने बंजर खेतो में इमारती लकड़ी के पेड़ लगाकर अच्छा खासा लाभ अर्जित कर सकते है। वो चाहते है कि देश के प्रधानमंत्री के स्वालम्बन और आत्मनिर्भरता के मंत्र में जान फूंकी जाय और लोकडौन की विषम परिस्थितियों को पलायन रोकने में साकार किया जाय। उन्होंने मायूसी भरे लहजे में कहा कि उनकी एक संस्था गुरु शिक्षा पर्यावरण महिला उत्थान समिति जिसके वे उपाध्यक्ष भी है पिछले दो वर्षों से सरकार से यमकेश्वर क्षेत्र में इमारती लकड़ी से लेकर फलदार पेड़ो को महिलाओं के माध्यम से रोपित करने की मांग कर रही है परन्तु सरकार ने इस ओर अभी तक ध्यान नही दिया जबकि सरकार हर बर्ष उसी गड्ढे में पेड़ लगाती आ रही जिसे उसे 10 वर्ष पूर्व खोदा था।

सुबोध नही का मानना है कि बृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम संस्था के माध्यम से होने से बेरोजगारों व महिलाओं को रोजगार भी प्राप्त होगा जिससे प्रधानमंत्री जी का स्वालम्बन का मंत्र सफल हो सकता है। खैर फ़िलहाल सुबोध नेगी अपने गांव कस्याळी में डटे हुए है और वँहा स्थित नलकूप के पानी का खूब सद्पयोग कर रहे है जिसे देखकर गांव के अन्य तीन युवक भी उनकी राह पर चलने को कमर कस चुके है।

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