रिवर्स पलायन से बदल रही उत्तराखंड की तस्वीर: गांव लौटे युवा बन रहे आत्मनिर्भरता की नई पहचान
अल्मोड़ा। वर्षों से उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पलायन रही है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं की तलाश में हजारों युवाओं ने अपने गांव छोड़कर महानगरों का रुख किया। इससे गांव खाली होते गए, खेती बंजर होती गई और पारंपरिक आजीविकाएं संकट में पड़ गईं।
लेकिन अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार की जनकल्याणकारी नीतियां इस तस्वीर को बदलती हुई दिखाई दे रही हैं। सरकार की ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना पहाड़ के युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है। इसका परिणाम है कि जनपद अल्मोड़ा में लगभग 30 युवाओं ने रिवर्स पलायन कर अपने पुश्तैनी गांवों में लौटने का निर्णय लिया और स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की नई शुरुआत की।

ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना के माध्यम से सरकार जैविक कृषि, पर्यावरण अनुकूल उत्पादन, कृषि एवं गैर-कृषि उद्यमों के लिए आर्थिक और तकनीकी सहयोग प्रदान कर रही है। इस सहायता का लाभ उठाकर युवाओं ने मुर्गीपालन, गौपालन, बागवानी, सब्जी उत्पादन, होमस्टे, फूड कार्ट, रेस्टोरेंट तथा अन्य स्वरोजगार शुरू किए हैं। इससे उन्हें गांव में ही सम्मानजनक आजीविका मिली है और वे अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।
भैंसियाछाना विकासखंड के हरीश राम पहले एक निजी कंपनी में मात्र 12 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर कार्य करते थे। गांव लौटकर उन्होंने मुर्गीपालन इकाई स्थापित की और आज लगभग 15 हजार रुपये प्रतिमाह की आय अर्जित कर रहे हैं।
इसी प्रकार भिकियासैंण विकासखंड के हिमांशु रौतेला बैकयार्ड पोल्ट्री फार्म के माध्यम से हर महीने लगभग 20 हजार रुपये की आय प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने इस व्यवसाय से 10 से अधिक लोगों को भी जोड़कर स्थानीय स्तर पर रोजगार का नया मॉडल तैयार किया है।
हवालबाग विकासखंड के गोलक रे रिवर्स पलायन के बाद गौपालन से जुड़कर दुग्ध एवं अन्य उत्पादों के माध्यम से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। वहीं ताड़ीखेत ब्लॉक के बालम सिंह नेगी अपने फास्ट फूड सेंटर के माध्यम से पहाड़ी और विदेशी व्यंजन उपलब्ध करा रहे हैं तथा लगभग 25 हजार रुपये प्रतिमाह का लाभ कमा रहे हैं।
कोरोना काल के बाद उत्तराखंड में शुरू हुआ रिवर्स पलायन अब केवल गांव लौटने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर उत्तराखंड की नई सोच का प्रतीक बन चुका है। युवा आधुनिक खेती, बागवानी, होमस्टे, स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग, डिजिटल माध्यमों से विपणन और पर्यटन आधारित उद्यमों के जरिए अपने गांवों की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं।
इस सकारात्मक बदलाव का असर पहाड़ों में साफ दिखाई दे रहा है। वर्षों से बंजर पड़ी कृषि भूमि पर फिर से खेती शुरू हो रही है। गांवों में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं, महिलाओं को भी आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने में सफलता मिल रही है तथा लोक संस्कृति, पारंपरिक खान-पान और ग्रामीण जीवनशैली को नया जीवन मिल रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार की मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना, होमस्टे योजना और अन्य स्वरोजगार आधारित योजनाएं युवाओं के लिए मजबूत आधार बन रही हैं। इन योजनाओं ने यह साबित किया है कि यदि सरकार की योजनाएं सही लाभार्थियों तक पहुंचें तो पलायन जैसी गंभीर समस्या का समाधान भी संभव है।
अल्मोड़ा के इन युवाओं की सफलता यह संदेश देती है कि उत्तराखंड का भविष्य उसके गांवों में ही बसता है। सरकार की दूरदर्शी नीतियों और युवाओं की मेहनत के बल पर अब पहाड़ों में विकास, रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखी जा रही है। यह बदलाव केवल रिवर्स पलायन नहीं, बल्कि “सशक्त गांव – समृद्ध उत्तराखंड” के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
