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जब हरेला बना जनआंदोलन, पत्रकारों से लेकर जवानों तक सबने निभाई जिम्मेदारी

के एस असवाल गौचर चमोली :हरेला की हरियाली : जब पत्रकार, जवान और ग्रामीण एक साथ उतरे प्रकृति बचाने

गौचर। हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति में प्रकृति के प्रति आस्था, जिम्मेदारी और जीवन के संतुलन का प्रतीक है। इस बार चमोली के गौचर क्षेत्र में हरेला का संदेश केवल गीतों और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलकनंदा नदी के तट पर धरातल पर उतरता दिखाई दिया।

ग्राम बन्दरखण्ड स्थित शिवालय मंदिर परिसर में भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ, उत्तराखंड की जनपद चमोली इकाई के सहयोग में आयोजित वृक्षारोपण एवं स्वच्छता अभियान ने यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण तभी सफल होगा, जब समाज का हर वर्ग इसमें सहभागी बने। इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि इसमें पत्रकारों के साथ भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान, वन विभाग, उद्यान विभाग, नगर पालिका, महिला मंगल दल, युवक मंगल दल और स्थानीय ग्रामीण एक मंच पर दिखाई दिए।

सुबह से ही मंदिर परिसर और अलकनंदा तट पर सफाई का कार्य शुरू हो गया। आईटीबीपी की 8वीं वाहिनी के जवानों ने सेनानी मनोहर सिंह रावत के सहयोग में झाड़ियों की सफाई कर पौधरोपण के लिए भूमि तैयार की। इसके बाद वन विभाग की ओर से औषधीय, छायादार और फलदार पौधे उपलब्ध कराए गए, जबकि उद्यान विभाग ने भी फलदार पौधों का वितरण किया। नगर पालिका के पर्यावरण मित्रों ने पूरे परिसर को स्वच्छ बनाकर स्वच्छता का संदेश दिया।

कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब महिला मंगल दल की महिलाओं ने पारंपरिक हरेला गीत गाए। पहाड़ की लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति श्रद्धा से जुड़े इन गीतों ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। यह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं आज भी पर्यावरण संरक्षण का सबसे मजबूत आधार हैं।

पत्रकार संघ के जिला अध्यक्ष दिगपाल गुंसाई ने सभी प्रतिभागियों को पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाते हुए कहा कि पौधरोपण केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यदि लगाए गए पौधों की देखभाल नहीं की गई तो ऐसे अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि संगठन भविष्य में भी सरकार और विभिन्न विभागों के सहयोग से जनहित और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार अभियान चलाता रहेगा।

आज जब जलवायु परिवर्तन, जंगलों में आग, जल स्रोतों के सूखने और बढ़ते प्रदूषण जैसी चुनौतियां सामने हैं, तब ऐसे सामुदायिक प्रयास उम्मीद जगाते हैं। हरेला का वास्तविक संदेश भी यही है कि प्रकृति से जितना लें, उससे कहीं अधिक उसे लौटाने का प्रयास करें।

अलकनंदा के किनारे रोपे गए ये पौधे आने वाले वर्षों में केवल हरियाली ही नहीं देंगे, बल्कि यह भी याद दिलाएंगे कि पर्यावरण संरक्षण सरकार या किसी एक विभाग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है। हरेला का यह आयोजन इसी सामूहिक जिम्मेदारी का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया।कार्यक्रम में आईटीबीपी के उपसेनानी अधिकारी विनोद कुमार, दर्शन लाल, बीट अधिकारी सम्पत सिंह रावत, राजकिशोर थपलियाल, वन क्षेत्राधिकारी नवल किशोर नेगी, उद्यान विभाग के नरेन्द्र बिष्ट, विधिक सेवा प्राधिकरण चमोली के देवेन्द्र कुमार, बन्दरखण्ड समिति के अध्यक्ष जगदीश सिंह कनवासी, सभासद विनोद कनवासी, मदन सिंह कनवासी, दिलवर सिंह बिष्ट, रामभगत भण्डारी, राजेश कनवासी, मयंक धरियाल, महिला मंगल दल अध्यक्ष सतेश्वरी देवी, विजया गुंसाई, राजेश्वरी बिष्ट, उर्मिला धरियाल, जशोन्दरा कनवासी, सोपती देवी, पूनम कनवासी, मनोरमा गुंसाई, मिलन भण्डारी, भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के जिला महामंत्री के. एस. असवाल, प्रदीप लखेड़ा, अरुण मिश्रा, देवेन्द्र गुंसाई, भानु प्रकाश नेगी, गोविन्द सिंह बिष्ट, लक्ष्मण सिंह पटवाल तथा  जनकल्याण लोकसेवा सेवा समिति के अध्यक्ष सुनील पंवार सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।महिला संगठन की अध्यक्ष सतेश्वरी कनवासी, विनीता भंडारी,सरिता भंडारी, जौसी भंडारी,दीपा भंडारी, शकुंतला भंडारी, पूनम कनवासी, पुनीता कनवासी, प्रभा कनवासी,आशा कनवासी, सतेश्वरी,कनवासी,संतोषी ,अरूणा, गुड्डी, निधि, बिमला, गुड्डी, रामेश्वरी, राजेश्वरी,उर्मिला,शशि, सोबती,जमनोत्री,शुशीला,आशा,बीना, सरिता, माधुरी मनोरमा,कंचन,जशुंधरा, उर्मिला,किसमति, जशोदा, सावित्री,सुसमा, विजया,नीलम सुनीता, अंजलि, उर्मिला,रामभरत,मिलन, मयंक, गौरव,अवशेक, राजे सिंह, दिलबर,मदन कनवासी आदि बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।