Wildlifeदेहरादून

“पहाड़ों में मौत का साया: गुलदार-भालू-सूअर के बढ़ते हमले, रातों-रात ‘रीलोकेशन’ पर सवाल, सरकार और वन विभाग कब जागेंगे?”

माता-पिता के सामने डेढ़ वर्षीय बच्ची को उठाकर ले गया गुलदार, मची चीख पुकार..

उत्तराखंड समेत पूरे पहाड़ी इलाकों में जंगली जानवरों—गुलदार, भालू, जंगली सूअर और बाघ—के हमले खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके हैं। बीते दो महीनों में 10 के लगभग गुलदार हमलों की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें सबसे ज़्यादा शिकार बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग बने हैं। इसके बावजूद सरकार और वन विभाग की तैयारियां सवालों के घेरे में हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मैदानी इलाकों और अन्य राज्यों से पकड़े गए गुलदार और बंदरों को आधी रात में पहाड़ों में छोड़ दिया जा रहा है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और बढ़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में दहशत का आलम यह है कि लोग सूरज ढलते ही घरों में कैद हो जा रहे हैं, बच्चों को बाहर भेजना बंद कर दिया गया है, फिर भी घटनाएं नहीं रुक रहीं।

आज की दर्दनाक घटना:

विकासखंड जयहरीखाल की ग्राम पंचायत बरस्वार में शनिवार शाम गुलदार डेढ़ वर्षीय बच्ची याशिका को उसके घर के आंगन से ही उठा ले गया। माता-पिता की आंखों के सामने हुई इस वारदात के बाद गांव में हड़कंप मच गया। करीब रात नौ बजे बच्ची का शव बुरी हालत में बरामद हुआ। यह घटना लैंसडौन वन विभाग के पालकोट जंगल क्षेत्र की बताई जा रही है। सूचना के बाद वन कर्मी मौके पर पहुंचे, लेकिन हमलों पर लगाम अब भी नहीं लग पाई है।

सवाल सीधे-सीधे:

जब हमले बढ़ रहे थे, तब वन विभाग की गश्त, पिंजरे और ट्रैकिंग कहां थी?
रीलोकेशन नीति पारदर्शी क्यों नहीं—कब, कहां और किस आधार पर जानवर छोड़े जा रहे हैं?
मानव बस्तियों के आसपास संवेदनशील इलाकों की पहचान और स्थायी समाधान क्यों नहीं?
पीड़ित परिवारों को तुरंत मुआवज़ा, सुरक्षा और जवाबदेही कब मिलेगी?

मांग:

सरकार तुरंत रीलोकेशन पर रोक/समीक्षा, रात्री गश्त और ड्रोन-ट्रैपिंग, संवेदनशील गांवों में स्थायी पिंजरे, फास्ट-ट्रैक मुआवज़ा, और वन विभाग की जवाबदेही तय करे। वरना पहाड़ों में यह मौत का सिलसिला थमने वाला नहीं है।
यह सिर्फ एक खबर नहीं, चेतावनी है। अब भी नहीं चेते तो अगला शिकार कोई और मासूम होगा।

 

Uma Shankar Kukreti