देहरादून

संविधान की पहली छपाई देहरादून में: भारतीय लोकतंत्र की एक अनकही ऐतिहासिक विरासत

भारत के संविधान की ऐतिहासिक यात्रा में देहरादून की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, लेकिन यह तथ्य राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित स्थान नहीं पा सका। जबकि सच्चाई यह है कि लोकतंत्र का यह पवित्र दस्तावेज पहली बार छपकर देशभर में देहरादून से ही पहुँचा था।
26 जनवरी 2026 को जब देश अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है, तब यह याद दिलाना आवश्यक है कि भारतीय संविधान केवल दिल्ली में लागू नहीं हुआ, बल्कि उसकी पहली मुद्रित पहचान देहरादून में आकार ले चुकी थी। यही कारण है कि उत्तराखंड और देहरादून का नाम भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

आज भी सुरक्षित है संविधान की वह ऐतिहासिक विरासत

भारतीय संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति आज भी संसद भवन में सुरक्षित रखी गई है। वहीं देहरादून के सर्वे चौक स्थित Survey of India कार्यालय के म्यूज़ियम में संविधान की एक ऐतिहासिक मुद्रित प्रति आज भी संरक्षित है, जो उस गौरवशाली कालखंड की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है।
यह वही स्थान है, जहाँ से संविधान की पहली छपी हुई प्रतियाँ देश के विभिन्न हिस्सों तक भेजी गई थीं।
हस्तलिखित संविधान: कला और लोकतंत्र का संगम
Survey of India की जियोडेसी एवं अनुसंधान शाखा के निदेशक नीरज गुर्जर के अनुसार, भारतीय संविधान की मूल प्रति प्रेम बिहारी नारायण रायजादा द्वारा हस्तलिखित की गई थी।
इस ऐतिहासिक दस्तावेज को नंदलाल बोस ने भारतीय इतिहास और संस्कृति से जुड़े चित्रों द्वारा अलंकृत किया, जिससे संविधान केवल कानूनी ग्रंथ ही नहीं, बल्कि एक कलात्मक धरोहर भी बन गया।
आज भी भारतीय संविधान को दुनिया के सबसे मजबूत और जीवंत लोकतांत्रिक दस्तावेजों में गिना जाता है।
कब बना और कब लागू हुआ संविधान
भारतीय संविधान को 26 नवंबर 1949 को अंगीकार किया गया
इसे 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू किया गया
इसी दिन भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना।
26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाने के पीछे यही ऐतिहासिक कारण निहित है।
संविधान निर्माण समिति: लोकतंत्र के शिल्पकार
भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा किया गया। इसकी मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे।
उनके साथ जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, के. एम. मुंशी और बी. एन. राव जैसे दिग्गज शामिल थे।
दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान तैयार करते समय सामाजिक न्याय, समानता, धर्मनिरपेक्षता और संघीय ढांचे को केंद्र में रखा गया।

देहरादून: लोकतंत्र की नींव का मौन साक्षी

आज जब देश संविधान के मूल्यों को याद करता है, तब बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस संविधान पर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र टिका है, उसकी पहली छपी हुई प्रतियाँ दिल्ली नहीं, बल्कि देहरादून में तैयार हुई थीं।
यह तथ्य न केवल उत्तराखंड के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत के लोकतंत्र की नींव में इस प्रदेश का योगदान कितना गहरा और ऐतिहासिक रहा है।

Uma Shankar Kukreti