केदारघाटी के सीमान्त गांवों के भेड़ पालकों ने छह माह प्रवास के लिए हिमालय की तलहटी में बसे बुग्यालों के लिए रुख कर दिया है।

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ऊखीमठ : केदारघाटी के सीमान्त गांवों के भेड़ पालकों ने छह माह प्रवास के लिए हिमालय की तलहटी में बसे बुग्यालों के लिए रुख कर दिया है। इस बार मौसम की बेरुखी के कारण भेड़ पालकों ने तीन सप्ताह बाद बुग्यालों की ओर रुख किया है! अब ये भेड़ पालक अक्टूबर से लेकर दीपावली तक वापस लौटते हैं। मगर भाद्रपद की पांच गते को बुग्यालों में भेड़ पालकों द्वारा मनाया जाने वाले लाई मेले के लिए भेड़ पालक निचले हिस्सों की ओर रुख कर देते हैं! बता दे कि केदारघाटी के त्रियुगीनारायण, तोषी,, चौमासी, जाल तल्ला, जाल मल्ला, चीलौण्ड, रासी, गौण्डार, उनियाणा, बुरुवा, गडगू, गैड़,सारी, पावजगपुणा, मक्कू व क्यूजा घाटी के अखोडी,मचकण्डी किणझाणी सहित विभिन्न गांवों के लगभग 60 प्रतिशत लोग आज भी भेड़ पालन व्यवसाय पर निर्भर हैं! इन भेड़ पालकों के ग्रीष्मकाल के छह माह बुग्यालों में प्रवास करने की परम्परा प्राचीन है! रासी गाँव से लगभग 32 किमी दूर सुरम्य मखमली बुग्यालों के मध्य विराजमान भगवती मनणा माई को भेड़ पालकों की आराध्य देवी माना जाता है! लोक मान्यताओं के अनुसार भगवती मनणा माई की पूजा अर्चना भेड़ पालकों द्वारा की जाती थी मगर धीरे – धीरे भेड़ पालन की परम्परा कम होने पर अब रासी के ग्रामीणों द्वारा भगवती मनणा माई की पूजा अर्चना की जाती है! विगत वर्षों की बात करे तो अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह से ही भेड़ पालक बुग्यालों की ओर रुख करते थे मगर इस वर्ष मौसम की बेरुखी के कारण भेड़ पालक अब बुग्यालों की ओर रुख कर रहे हैं, छह माह बुग्यालों में रहने वाले भेड़ पालकों का हिमालय प्रवास का समय बहुत ही कष्टकारी होता है। बिना बिजली के रात्रि गुजारन,संचार युग में भी संचार सेवा से वंचित रहना, खुले आसमान में रात्रि गुजारना, जंगली जानवरों से भेड़ों की रक्षा करना तथा कई किमी पैदल चलकर पीठ में लादकर खाघान्न सामाग्री पहुंचाना सहित कई चुनौतियों तो हैं मगर इन चुनौतियों का सामना कर यहाँ के जनमानस ने भेड़ पालन व्यवसाय को जीवित रखा हुआ है। भाद्रपद की पांच गते को बुग्यालों में भेड़ पालकों द्वारा मनाया जाने वाले लाई मेले में भेड़ पालकों व ग्रामीण के बीच भाईचारे का अनूठा संगम दिखाई देता है! उस दिन भेड़ पालकों के छोटे बच्चे भी अपने भेड़ को मिलने के लिए बडे़ उत्साह व उमंग से जाते हैं। जिला पंचायत सदस्य कालीमठ विनोद राणा बताते है कि भेड़ पालकों का जीवन बड़ा ही कष्टदायक होता है! मदमहेश्वर घाटी विकास मंच के अध्यक्ष मदन भटट् का कहना है कि यदि प्रदेश सरकारे भेड़ पालन व्यवसाय को बढ़ावा देती है तो अन्य लोग भी भेड़ पालन व्यवसाय को आजीविका के रूप में अपना सकते हैं!

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