राजनीतिक दृश्यता एवं महिला अभिकरण को मुखर आवाज देने वाले नारी शक्ति वंदन बिल का गिरना लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंताजनक डॉ. केतकी तारा कुमैय्या
डॉ. केतकी तारा कुमैय्या
राजनीतिक विश्लेषक
नेपाल में नव-निर्वाचित बालेन्द्र शाह जैसे युवा नेता रैपर से सत्ता के शीर्ष तक पहुंच जाते हैं, वहीं भारत 21वीं सदी में भी स्त्री-पुरुष भेद के जाल में उलझा हुआ दिखाई देता है। आज संसद में नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद नारी शक्ति वंदन बिल को दो-तिहाई बहुमत न मिल पाना गंभीर चिंता का विषय है।
यदि इस मुद्दे को परिसीमन के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है, तो सीटों की संख्या में वृद्धि सभी वर्गों के हितों को सुरक्षित कर सकती है। परिवर्तन और अनुकूलनशीलता ही नवाचार की जननी है—और इस बिल के भीतर भी अनेक दूरगामी सकारात्मक संभावनाएं निहित हैं। इसे लागू करने से न किसी क्षेत्र का हनन होगा, न पुरुषों का, न महिलाओं का—बल्कि यह एक नई राजनीतिक संरचना का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
भारतीय लोकतंत्र विश्व के लिए एक मार्गदर्शक रहा है। जब दुनिया के कई देशों में महिलाओं को संवैधानिक प्रतिनिधित्व तक नहीं मिला था, तब भारत की संविधान सभा में 15 महिलाएं सदस्य थीं। जहां अमेरिका जैसे विकसित लोकतंत्र में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई, वहीं भारत ने महिला राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई केंद्रीय पदों पर महिलाओं को प्रतिष्ठित किया है।
आज नारी शक्ति वंदन संशोधन बिल का गिरना केवल एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि महिलाओं के संघर्षों और आकांक्षाओं की हार के रूप में देखा जाना चाहिए। वैदिक काल की विदुषी महिलाएं—अपाला, गार्गी, लोपामुद्रा, मैत्रेयी—जिन्होंने शास्त्रार्थ में अपनी विद्वता सिद्ध की, उनके वंशज आज भी अपने अधिकारों के लिए सड़कों से संसद तक संघर्ष करने को विवश हैं—यह वास्तव में चिंताजनक है।
समय बदला, संवत्सर बदले, ऋतुएं बदलीं—लेकिन जो नहीं बदली, वह है मानसिकता। राष्ट्रीय महिला दिवस, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अवसर केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं, जब एक प्रगतिशील विधेयक को सुनियोजित तरीके से गिराया जाता है।
देश जहां विकास के नए आयाम छू रहा है, वहीं आधी आबादी को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखना लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न है। समानता और समता जैसे शब्द अब खोखले प्रतीत होने लगे हैं। ऐसे समय में जे. जयललिता का वह प्रसंग स्मरण होता है, जब उन्हें सत्ता में रहते हुए भी सार्वजनिक अपमान और राजनीतिक दुराग्रह का सामना करना पड़ा।
हालांकि राजनीति एक बिसात है, और कभी-कभी हार भी भविष्य की जीत का मार्ग प्रशस्त करती है। यह बिल भी उसी दिशा में एक संकेत है—जहां आज की हार कल की ऐतिहासिक जीत बन सकती है।
यह विषय पक्ष-विपक्ष का नहीं, बल्कि लैंगिक संवेदनशीलता का है। भारतीय संसदीय परंपरा में महिलाओं के सम्मान के उदाहरण भी मौजूद हैं—जैसे अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कहना, या अमित शाह द्वारा प्रियंका गांधी वाड्रा के वक्तृत्व कौशल की सराहना करना।
भारतीय लोकतंत्र की दूरदर्शी सोच को आज भी पश्चिमी देश उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए नारी शक्ति वंदन बिल को केवल एक संसदीय हार के रूप में नहीं, बल्कि एक अधूरी यात्रा के रूप में देखा जाना चाहिए—जिसे पुनः स्थापित करना समय की मांग है।
अंततः, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में—
“सरकारें आएंगी जाएंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए।”
