गौचरचमोली

उत्तराखंड की पहाड़ियों में आज भी सांस ले रही है महाभारत की परंपरा

गौचर / चमोली।
उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में आज भी ऐसी परंपराएं जीवित हैं, जो न केवल इतिहास की याद दिलाती हैं, बल्कि वर्तमान समाज को धर्म, मर्यादा और संघर्ष का रास्ता भी दिखाती हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है पांडव लीला, जो इन दिनों गौचर नगर पालिका क्षेत्र के पनाई गांव तथा विकासखंड पोखरी की गंगा घाटी के बमोथ, करछुना सहित कई गांवों में पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ आयोजित की जा रही है।
जैसे ही गांव की चौपाल में ढोल-दमाऊं की थाप गूंजती है, वातावरण बदलने लगता है। पंडितों द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ पांडवों और द्रौपदी का आवाहन किया जाता है। माना जाता है कि इस दौरान कलाकार केवल अभिनय नहीं करते, बल्कि वे पांडवों के पाश्व रूप में अवतरित होते हैं। नृत्य, जागर और संवाद के माध्यम से महाभारत की कथाएं मानो सजीव हो उठती हैं।

मनोरंजन नहीं,आस्था का अनुष्ठान

पांडव लीला को केवल लोकनृत्य या मंचीय प्रस्तुति कहना इसकी आत्मा को कम आंकना होगा। यह आयोजन ग्रामीण समाज के लिए एक आध्यात्मिक और सामाजिक अनुष्ठान है। इसमें धर्म और अधर्म के संघर्ष, सत्य की विजय, नारी सम्मान और कर्तव्यबोध जैसे संदेश पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के मन में उतरते हैं।

गौचर व्यापार संघ के अध्यक्ष एवं पनाई गांव के सामाजिक कार्यकर्ता राकेश लिंगवाल बताते हैं कि पांडव लीला उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान है। यह आयोजन गांव को जोड़ता है, सामाजिक समरसता को मजबूत करता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। उन्होंने बताया कि इस आयोजन को सफल बनाने में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिला मंगल दलों, युवक मंगल दलों और ग्रामवासियों ने सामूहिक सहभागिता निभाई।

पलायन के बावजूद गांव की ओर लौटती आस्था

करछुना पांडव लीला समिति से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सुबेदार खुशाल सिंह कहते हैं कि भले ही रोज़गार और आधुनिक जीवन की तलाश में लोग गांवों से बाहर चले गए हों, लेकिन पांडव लीला के समय प्रवासी लोग गांव लौटते हैं। यह परंपरा उन्हें अपनी मिट्टी से फिर जोड़ देती है।

उनका मानना है कि पांडव लीला केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि गांव की आत्मा है। इसी के माध्यम से बुजुर्ग अपनी आस्था और अनुभव नई पीढ़ी को सौंपते हैं।

युवाओं के कंधों पर परंपरा की जिम्मेदारी

बमोथ गांव पांडव लीला समिति के पंडित प्रदीप लखेड़ा बताते हैं कि आज के युवा भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में पीछे नहीं हैं। वे सीख रहे हैं कि किस तरह मंत्रोच्चारण, नृत्य और अनुशासन के साथ इस पौराणिक कथा को प्रस्तुत किया जाता है। यह संकेत है कि पांडव लीला आने वाले समय में भी जीवित रहेगी।

संस्कृति की जड़ें, भविष्य की राह

तेजी से बदलते समय में जब लोक परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं, ऐसे में पांडव लीला जैसे आयोजन उत्तराखंड की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हैं। यह परंपरा न केवल अतीत को सहेजती है, बल्कि समाज को यह याद दिलाती है कि संघर्ष के हर दौर में धर्म और सत्य ही मार्गदर्शक होते हैं।
पांडव लीला वास्तव में उत्तराखंड की पहाड़ियों में बहती उस सांस्कृतिक धारा का नाम है, जो समय के साथ-साथ आज भी अविराम बह रही है।

K. S. Aswal