*सेवा ही धर्म: आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की नैतिकता, निष्ठा और जनसेवा की मिसाल”*
देहरादून/उत्तराखंड। अमित भट्ट
जहाँ एक ओर सरकारी पदों पर बैठे लोगों पर अक्सर सुविधाओं के दुरुपयोग और व्यक्तिगत लाभ के आरोप लगते हैं, वहीं उत्तराखंड कैडर के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने एक बार फिर यह साबित किया है कि सच्ची सेवा भावना आज भी जीवित है। उन्होंने अपने आधिकारिक दौरों के दौरान प्राप्त ₹3 लाख की राशि को मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कर एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।
यह राशि उन्हें 17 जून 2016 से 31 अगस्त 2025 के बीच कुल 447 दिनों के आधिकारिक दौरों के लिए भत्ते के रूप में प्राप्त हुई थी। आमतौर पर ये भत्ते अधिकारी अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए उपयोग करते हैं, लेकिन चतुर्वेदी ने इसे जनहित में समर्पित कर दिया। एक आधिकारिक पत्र के माध्यम से उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि यह पूरी राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा की जाए।
*सेवा भावना का मूल —* “देवभूमि के प्रति समर्पण”
अपने पत्र में चतुर्वेदी ने स्पष्ट किया कि उनका यह निर्णय किसी दिखावे का नहीं, बल्कि उत्तराखंड—जिसे ‘देवभूमि’ कहा जाता है—की सेवा करने की आंतरिक प्रेरणा से लिया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य की प्राकृतिक सुंदरता, पर्यावरणीय संतुलन और आध्यात्मिक विरासत को बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। ऐसे में, यदि उनकी छोटी-सी योगदान से किसी जरूरतमंद की सहायता हो सके, तो यही उनके लिए सबसे बड़ी संतुष्टि है।
*पहले भी कर चुके हैं कई प्रेरणादायक कार्य*
यह पहला अवसर नहीं है जब संजीव चतुर्वेदी ने अपनी ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व का परिचय दिया हो।
वर्ष 2015 में उन्हें एशिया के प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस सम्मान के साथ मिली पूरी पुरस्कार राशि उन्होंने प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दी।
फरवरी 2019 में हुए पुलवामा अटैक में शहीद हुए सीआरपीएफ जवान के परिवार को लगभग ₹2.50 लाख की सहायता दी।
दिसंबर 2015 में एक अन्य भ्रष्टाचार विरोधी पुरस्कार के तहत मिली ₹2.4 लाख की राशि भी उन्होंने एक जरूरतमंद परिवार को समर्पित कर दी।
इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए सेवा केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य है।
प्रशासनिक ईमानदारी का जीवंत उदाहरण आज के दौर में जब प्रशासनिक तंत्र पर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठते रहते हैं, ऐसे में चतुर्वेदी जैसे अधिकारी व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करते हैं। उनका यह कदम यह संदेश देता है कि यदि इच्छा और नीयत साफ हो, तो सरकारी पद भी जनसेवा का सशक्त माध्यम बन सकता है। समाज के लिए प्रेरणा उनका यह कार्य केवल एक आर्थिक योगदान नहीं, बल्कि एक नैतिक संदेश भी है। यह संदेश है कि समाज के हर वर्ग—चाहे वह सरकारी अधिकारी हो, व्यापारी हो या आम नागरिक—को अपनी सामर्थ्य के अनुसार समाज के प्रति योगदान देना चाहिए।
संजीव चतुर्वेदी का यह कदम न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह दिखाया है कि सच्ची सेवा पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि नीयत और कर्म से होती है। ऐसे उदाहरण ही समाज में सकारात्मक बदलाव की नींव रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा दिखाते हैं।
