देहरादून

क्या संसद में बहस की जगह शोर ने ले ली है?

देहरादून /भारतीय संसद को लंबे समय से “लोकतंत्र का मंदिर” कहा जाता रहा है। यह वह मंच है जहाँ देश के जनप्रतिनिधि जनता की आवाज़ बनकर नीतियों पर विचार-विमर्श करते हैं, सरकार से जवाब मांगते हैं और देश के भविष्य को दिशा देने वाले कानून बनाते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही को देखकर एक गंभीर प्रश्न उठता है—क्या संसद में बहस की परंपरा कमजोर पड़ रही है और उसकी जगह शोर, विरोध और अव्यवस्था ने ले ली है?

लगातार हंगामे, नारेबाजी और कार्यवाही में बाधा अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य दृश्य बन चुके हैं। संसद की कार्यवाही बाधित होने से न केवल महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाती, बल्कि जनता का अपने सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान पर भरोसा भी कमजोर होता है। जब कानून बिना पर्याप्त बहस के पारित होते हैं या विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही प्रभावित होती है।

संविधान ने संसद की गरिमा और अनुशासन बनाए रखने के लिए पर्याप्त प्रावधान किए हैं। अनुच्छेद 118 संसद को अपने कार्य संचालन के नियम बनाने की शक्ति देता है, जबकि लोकसभा और राज्यसभा के नियम पीठासीन अधिकारियों को अव्यवस्थित सदस्यों को निलंबित या बाहर करने का अधिकार देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि संसद में अव्यवस्था और हिंसात्मक व्यवहार विशेषाधिकार के दायरे में नहीं आता। इसके बावजूद, इन शक्तियों का प्रभावी उपयोग बहुत कम देखने को मिलता है।

यह स्थिति केवल विपक्ष या केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सरकार को जवाबदेह बनाए, लेकिन इसके लिए संसद को ठप करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। वहीं, सरकार का दायित्व है कि वह महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक चर्चा सुनिश्चित करे और संसदीय समितियों की भूमिका का सम्मान करे। संसद बहस का मंच है, टकराव का नहीं।

अब समय आ गया है कि संसद की गरिमा और प्रभावशीलता को बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ। “नो वर्क, नो पे” जैसे नियमों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि जानबूझकर कार्यवाही बाधित करने वालों को जवाबदेह बनाया जा सके। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी महत्वपूर्ण कानून पर्याप्त बहस और समीक्षा के बिना पारित न हो।

लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि संसद के भीतर होने वाली सार्थक बहस में निहित होती है। यदि संसद में संवाद की जगह शोर ले लेता है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है। जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि वे केवल राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि देश की जनता के विश्वास के संरक्षक हैं।

भारतीय संसद की गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए संसद को फिर से विचार, संवाद और राष्ट्रनिर्माण का सशक्त मंच बनाएंगे।

 

THE WRITER IS A FORMER IFS OFFICER AND CHAIRMAN OF CENTRE FOR RESOURCEM ANAGMENT  AND ENVIRONMENT

 

Uma Shankar Kukreti